Skip to main content

शिक्षक_दिवस




 आप  सभी  को  शिक्षा  दिवस  की  हार्दिक  शुभकामनाएं...  मेरा  उन  सभी  शिक्षकों  और  गुरु  को  सत-सत  नमन  है,  जो  जिंदगी  के  हर  मोड़  पर  कुछ  न  कुछ  सिखाते  रहते  है।  वैसे  तो  हर  एक  गुरु  अपने  शिष्य  की  जिंदगी  लिखता  है,  पर  आज  एक  छोटी  सी  कोशिश  है  एक  शिष्य  की  अपने  गुरुओ  को  अपनी  लेखनी  से  सम्मान  देने  की...

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।

                         भावार्थ:
गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु हि शंकर है। गुरु हि साक्षात् परब्रह्म है, उन सद्गुरु को प्रणाम।

जिस  प्रकार  एक  बीज  के  अंकुरित  होने से  लेकर  उसके  वृक्ष  बनने  तक  कई  चरण  होते  है,  (जैसे- बीज, जड़, तना, साखे, फल  आदि)  वैसे  ही  एक  इंसान  का  जीवन  भी  कई  चरणों  से  होकर  गुजरता  है  और  जीवन  के  हर  चरण  में  जाने  अनजाने  कितने  ही  गुरु  हमे  मिलते  है।  जो  जीवन  के  हर  उतार-चढ़ाव  की  हमे  सिख  देते  है,  जो  जीवन  मे  आने  वाली  हर  कठिनाइयों  से  लड़ने  और  संघर्ष  का  हौसला  देते  है,  हमे  सिखाते  है  जबतक  हम  खुद  हार  नही  मान  लेते  तब  तक  हमे  कोई  हरा  नही  सकता
            
                        जैसे  जमीन  में  लगे  एक  बीज  को  हम  सींच  सींच  कर  वजूद  बनाते  है,  वैसे  ही  हमारे  पहले  गुरु  जो  माता-पिता  के  रूप  में  होते  है  हमे  प्यार, संस्कार  और  ऐसे  ही  कई  गुणों  से  हमे  सींचते  है  और  तब  हम  अपना  पहला  कदम  रखते  है  दुनिया  की  तरफ  और  तब  हमारी  मुलाकात  हमारे  दूसरे  गुरु  से  होती  है,  जिस  प्रकार  एक  बीज  सींचते  सींचते  एक  पौधे  का  रूप  लेता  है  तो  हम  उसे  ऐसे  ढालते  है  कि  वो  हमेशा  सीधा  खड़ा  रहे। 
                     वैसे  ही  ये  हमे  दुनियारूपी  एक  मंच  के  लिए  तैयार  करते  है।  जो  हमे  सिखाते  है  कि  जिंदगी  एक  इम्तिहान  है,  यहा  हर  कदम  पर  परीक्षा  देनी  होती  है,  हर  कदम  पर  हमें  खुद  को  खुद  से  थोड़ा  और  आगे  निकलने  का  मौका  मिलता  है  इसलिए  हर  परीक्षा  हमे  पूरी  जिम्मेदारी  के  साथ  देनी  चाहिए  फिर  चाहे  उसमे  हार  हो  या  जीत...

उपाध्यायान् दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता।
सहस्रं तु पितृन् माता गौरवेणातिरिच्यते।।
                                     (मनुस्मृति)

                      भावार्थ:
दस उपाध्यायों से बढ़कर एक आचार्य होता है, सौ आचार्यों से बढ़कर पिता होता है और पिता से हजार गुणा बढ़कर माता गौरवमयी होती है।

इसी  दौरान  हम  जीवन  के  एक  और  चरण  में  जाते  है,  जैसे  एक  पौधा  बढ़ने  के  बाद  अपनी  शाखाएं  फैलाना  शुरू  करता  है,  वैसे  ही  हम  अब  अपने  दायरों  को  बढ़ाते  है,  और  दोस्त  और  दोस्ती  के  रिश्तों  में  बंधते  है। ये  वो  गुरु  जो  हमे  सिखाते  है  कि  कई  बार  हम  जो  अकेले  रहकर  नही  कर  पाते  उसे  सब  मिलकर  बड़े  ही  आराम  से  कर  लेते  है,  जो  हमे  सिखाते  है  कि  जिंदगी  को  जिंदगी  कैसे  बनाई  जाती  है।
                              और  फिर  जैसे  एक  पौधा  पेड़  बन  जाने  और  अपनी  शाखाये  फैलाने  के  बाद  उनपर  फल  देकर  सम्पूर्ण  होता  है,  वैसे  ही  गृहस्थ  जीवन  मे  पहुचकर  हम  अपनी  जिंदगी  के  अगले  गुरु  से  मिलते  है  जो  हमे  जिम्मेदारियां  और  सब्र  रखना  सिखाता  है।

इस  प्रकार  हम  पूरी  जिंदगी  सीखते  है,  और  हर  कदम  हमे  कोई  न  कोई  गुरु  मिलता  है,  जिससे  जाने  अनजाने  हम  सबकुछ  सिखकर  अपने  जीवन  को  सम्पूर्ण  करते  है,  तब  जाकर  कही  हम  मानव  और  मानवता  भरे  इस  जीवन  को  एक  मुकाम  पर  ले  जाकर  खत्म  करते  है,  और  यही  हमे  इंसान  बनाता  है  और  मरने  के  बाद  भी  हमे  कही  न  कही  जिंदा  रखता  है।

अब  बस  यही  कहूंगा  कि  कोख  से  निकलकर  पहली  सांस  से  जो  शिक्षक  मुझे  मिले  उन  सब  को  मेरा  कोटि  कोटि  प्रणाम!  मैं  इतने  शब्दो  मे  भी  आप  गुरुजनों  की  महानता  नही  समझा  सका  इसके  लिए  माफी  चाहता  हू। अंत  में  बस  यही  लिखूंगा-

येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः !
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति !!
                       भावार्थ :
जिन लोगो के पास विद्या, तप, दान, शील, गुण और धर्म नहीं होता. ऐसे लोग इस धरती के लिए भार है और मनुष्य के रूप में जानवर बनकर घूमते है.

Comments

  1. अभी टहनी हैं, पेड़ न हो सके
    इतने भी काबिल नही हुए हैं हम
    कि गुरु पे लिख सके

    Happy Teachers Day

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत सही बात लिखे हो.. पर ये अपनी काबिलियत दिखाने के लिए नही बस अपने शब्दो से एक छोटा सा सम्मान लिखने की कोशिश थी, मुझे पता है कि झरने समुंदर की गहराइयों को कभी नाप नही सकते। फिर भी कोई गलती हुई हो तो माफ करना🙏

      Delete
  2. Jisne likhna sikhaya usey is awasr pr ek tribute to apne lekh k madhyam se diya hi ja skata hai vihnu bhai. Bhisam ko bhi jrurt pdne pr apne guru se yuddh krna pada tha. Pr isme unke guru ka hisamman tha.

    ReplyDelete
    Replies
    1. Haa bhai Bilkul... Guruwo ki mhanata to u ek choti si kahani me nhi sma skti h...

      Delete
    2. Pr fir bhi kosise to brabar krti rhni chahiye... Bolkr.. likhkr.. kyuki ye bhi unhe se mile hue gun h

      Delete
  3. Best of luck bro...
    Aur bhi lekh likhte rahna ....

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

पिता की जुबानी!

  तब सोचा था एक सुनहरा कल होगा। आज भले ही नौकर है कहि पर, पर कल अपना भी एक बड़ा घर होगा। आज लिखते हुए देखता हूं, अपने छोटे से बच्चे को तो बहुत गर्व होता है। खुद तो पढा लिखा नही हूं, पर उसका लिखा पढ़ लेता हूं। खूब मेहनत कर के उसे अच्छे स्कूल में भेजने की चाहत है। जो मैं ना पा सका वो सब उसे दिलाने की चाहत है। अब ड्यूटी डबल करने का समय आ गया है। मेरा बेटा अब स्कूल जाने के लायक हो गया है। उसकी फीस उसकी पढ़ाई में रुकावट ना बने, इसलिए थोड़ी बचत करने का समय आ गया है। मेरी बीवी की चाहते बिल्कुल खत्म सी हो गयी है। क्योंकि उसको भी बच्चे को पढाने की, फिक्र सी हो गयी है। उसे मालूम है पढ़ लिख जाएगा तो बड़ा साहब बनेगा, तब मेरी सारी इच्छाओं को वो, खुद ही पूरा करेगा। घर मे 24घण्टे रोशनी की व्यवस्था कर दी है। हम भले ही 2 रोटी कम खाये पर उसके लिए टिफ़िन की व्यवस्था कर दी है। अब तो बस फिक्र रहती है, कोई रुकावट न आये पढ़ाई में उसके। इधर उधर की आदतों को छोड़, उसके ट्यूशन की भी व्यवस्था कर दी है। छाती गर्व से फूल गयी माँ-बापू की, बेटे ने बोर्ड में टॉप किया। पर अंदर मन मे ये चिंता है, की अब बेटा स

Engineering Aur Pyaar (8) The End!

Chapter-8                  आने वाला कल( The End)      कई  बार  जब  हम  किसी  के  साथ  होते  है  या  जब  कोई  हमारा  बहुत  खास  बन  जाता  है,  तो  हमें  लगने  लगता  है  की  अब  यहां  से  हम  उसके  बिना  रह  नही  सकते  पर  जिंदगी  को  सुलझाने  में  हम  इतने  उलझ  जाते  है  कि  कुछ  तो  खुद  ही  भूल  जाते  है  हम  और  कुछ  भूल  जाने  का  नाटक  करते  है।           कॉलेज  के  फेयरवेल  के  कुछ  दिन  बाद  ही  हमारी  परीक्षाएं  शुरू  हो  गयी  थी,  क्योंकि  दोनों  की  परीक्षाएं  अलग  अलग  जगह  पर  थी  इसलिए  मुलाकात  नही  हो  पाती  थी।  सभी  को  इंतज़ार  था  कि  जैसे-तैसे  ये  सब  खत्म  हो  और  छुट्टियों  में  घर  जाया  जाए।  पर  इस  बार  मैं  नही  चाहता  था  कि  ये  परीक्षाएं  ये  दिन  खत्म  हो,  मैं  जैसे  समय  को  रोकने  की  सोच  में  था।  पर  ऐसा  मुमकिन  ना  था  और  हमारे  प्रैक्टिकल्स  वगैरह  सब  खत्म  हो  गए  और  2 महीने  की  छुट्टियां  हो  गयी  सब  अपने  अपने  घरों  को  चल  दिये  पर  मैं  बहाने  सोचने  में  था  लेकिन  उस  साल  हमारी  ट्रेनिंग  होनी  थी  तो  मुझे  मजबूरी  में  जाना  ही

Jindgi Aur Sapne (part-3)

# मंज़िल ~~~ कई  बार  हमें  अपनी  मंज़िल  पता  नही  होती  है,  पर  फिर  भी  हम  चलते  रहते  है  लेकिन  कहि  न  कही  रास्ते  के  किसी  मोड़  पर  जब  हम  कुछ  पल  के  लिए  रुकते  है,  तब  ख्याल  आता  है  कि  लोगो  को  देखकर  ये  जो  रास्ता  चुना  है  मैंने  क्या  इन  रास्तों  पर  चलते  हुए  कोई  मुझे  मुझ  जैसे  मिलेगा  या  फिर  शायद  एक  रोज़  इन  बेमन  के  रास्तों  पर  चलते-चलते  मैं  खुद  का  वजूद  कहि  खो  दूंगा  और  एक  दिन  शायद  किसी  मंज़िल  तक  मैं  पहुच  भी  जाऊं  लेकिन  अगले  ही  पल  मुझे  खुद  को  ढूंढना  होगा। मंज़िल  से  भटके  हुए  इंसान  पर  आधारित  एक  कविता  कृपया  इसे  पूरा  अवश्य  पढ़ें! धन्यवाद🙏 ~~~ मैं  तलाश  में  हू   खुद  के  ढूंढता  हू दर-ब-दर  अपने  ही  निशान! कभी  ख्यालो  के  पीछे  ढूंढता  हू   खुद  को, कभी  दरवाज़े  के  पीछे  तलाशता  हू ! किसी  आवाज़  का  पीछा  कर  लेता  हूं  यूही  कभी, कभी  लाख  चिल्लाने  पर  भी  सन्नाटा  पसरा  रहता  है! ना  जाने  कहा  खो  दिया  मैंने  खुद  को! कभी  परछाइयों  के  पीछे  भागता  हू , कभी  आईने  में  तलाशता  हू   खुद  को! कभी