Skip to main content

छठ पूजा!🙏

 

छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है।

 इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं।  इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।

छठ में कोई मूर्तिपूजा शामिल नहीं है।

शुरुवात-

छठ पूजा की परम्परा और उसके महत्त्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएँ प्रचलित हैं।

देव सूर्य मंदिर (बिहार)
Image source: google

मान्यता है की देव माता अदिति ने की थी छठ पूजा। एक कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलायी। कहते हैं कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का चलन भी शुरू हो गया।

रामायण से
                         एक मान्यता के अनुसार  लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।

महाभारत से
                            एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन घण्टों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे। सूर्यदेव की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है।

कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लम्बी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं।

पुराणों से
                           एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनायी गयी खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परन्तु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गये और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त ब्रह्माजी की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूँ। हे! राजन् आप मेरी पूजा करें तथा लोगों को भी पूजा के प्रति प्रेरित करें। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।


छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है।

पहला दिन- नहाय खाय

छठ पर्व का पहला दिन जिसे ‘नहाय-खाय’ के नाम से जाना जाता है,उसकी शुरुआत चैत्र या कार्तिक महीने के चतुर्थी कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से होता है ।


दूसरा दिन- खरना और लोहंडा

छठ पर्व का दूसरा दिन जिसे खरना या लोहंडा के नाम से जाना जाता है,चैत्र या कार्तिक महीने के पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन व्रती पुरे दिन उपवास रखते है . इस दिन व्रती अन्न तो दूर की बात है सूर्यास्त से पहले पानी की एक बूंद तक ग्रहण नहीं करते है। शाम को चावल गुड़ और गन्ने के रस का प्रयोग कर खीर बनाया जाता है।इसके बाद अगले 36 घंटों के लिए व्रती निर्जला व्रत रखते है।


तीसरा दिन- संध्या अर्घ्य

छठ पर्व का तीसरा दिन जिसे संध्या अर्घ्य के नाम से जाना जाता है,चैत्र या कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है।नदी या तालाब के किनारे जाकर महिलाये घर के किसी सदस्य द्वारा बनाये गए चबूतरे पर बैठती है।सूर्यास्त से कुछ समय पहले सूर्य देव की पूजा का सारा सामान लेकर घुटने भर पानी में जाकर खड़े हो जाते है और डूबते हुए सूर्य देव को अर्घ्य देकर पांच बार परिक्रमा करते है।


चौथा दिन- उषा अर्घ्य

चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। सूर्योदय से पहले ही व्रती लोग घाट पर उगते सूर्यदेव की पूजा हेतु पहुंच जाते हैं और शाम की ही तरह उनके पुरजन-परिजन उपस्थित रहते हैं। सभी नियम-विधान सांध्य अर्घ्य की तरह ही होते हैं। सिर्फ व्रती लोग इस समय पूरब की ओर मुंहकर पानी में खड़े होते हैं व सूर्योपासना करते हैं। पूजा-अर्चना समाप्तोपरान्त घाट का पूजन होता है।व्रति घर वापस आकर गाँव के पीपल के पेड़ जिसको ब्रह्म बाबा कहते हैं वहाँ जाकर पूजा करते हैं। पूजा के पश्चात् व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं जिसे पारण या परना कहते हैं। व्रती लोग खरना दिन से आज तक निर्जला उपवासोपरान्त आज सुबह ही नमकयुक्त भोजन करते हैं।


सामाजिक/सांस्कृतिक महत्त्व


छठ पूजा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी पवित्रता और लोकपक्ष है। भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व में बाँस निर्मित सूपटोकरीमिट्टी के बर्त्तनों, गन्ने का रस, गुड़चावल और गेहूँ से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है।


                शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में गढ़ी गयी उपासना पद्धति है। इसके केंद्र में वेदपुराण जैसे धर्मग्रन्थ न होकर किसान और ग्रामीण जीवन है। इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पुरोहित या गुरु के अभ्यर्थना की। जरूरत पड़ती है तो पास-पड़ोस के सहयोग की जो अपनी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञतापूर्वक प्रस्तुत रहता है। इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है। नगरों की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबन्धन, तालाब या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था के लिए समाज सरकार के सहायता की राह नहीं देखता। इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है। यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा-भाव और भक्ति-भाव से किये गये सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन है।

                त्यौहार के अनुष्ठान कठोर हैं और चार दिनों की अवधि में मनाए जाते हैं। इनमें पवित्र स्नान, उपवास और पीने के पानी (वृत्ता) से दूर रहना, लंबे समय तक पानी में खड़ा होना, और प्रसाद (प्रार्थना प्रसाद) और अर्घ्य देना शामिल है। परवातिन नामक मुख्य उपासक (संस्कृत पार्व से, जिसका मतलब 'अवसर' या 'त्यौहार') आमतौर पर महिलाएं होती हैं। हालांकि, बड़ी संख्या में पुरुष इस उत्सव का भी पालन करते हैं क्योंकि छठ लिंग-विशिष्ट त्यौहार नहीं है। छठ महापर्व के व्रत को स्त्री - पुरुष - बुढ़े - जवान सभी लोग करते हैं।

पर्यावरणविदों का दावा है कि छठ सबसे पर्यावरण-अनुकूल हिंदू त्यौहार है। 

सूर्य पूजा का संदर्भ

छठ उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है जो एक कठिन तपस्या की तरह है। यह छठ व्रत अधिकतर महिलाओं द्वारा किया जाता है; कुछ पुरुष भी इस व्रत रखते हैं।
छठ पर्व मूलतः सूर्य की आराधना का पर्व है, जिसे हिन्दू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिन्दू धर्म के देवताओं में सूर्य ऐसे देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है।

सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अर्घ्य देकर दोनों का नमन किया जाता है।

छठ के आज पावन त्यौहार
सूरज की लाली, माँ का हैं उपवास
जल्दी से आओ अब करो न विचार
छठ पूजा का खाने तुम प्रसाद

🙏छठ पूजा की शुभकामनाएँ🙏 

                                                   स्रोत:- गूगल


मान्यताएं और  कथाएं  कुछ  भी  हो  पर  छठ  पूजा  की  महानता  महिलाओं - पुरुषों  के  विश्वास  और  उनके  कठिन  तप  से  महान  बनता  है,  किसी  भी  चमत्कार  और  विश्वास  की  पराकष्ठा  क्या  होती  होगी,  यही  की  हमारा  जिसमे  विश्वास  है  वो  हमारे  विश्वास  को  कैसे  बनाये  रखता  है  और  कैसे  हमे  अपनी  ओर  आकर्षित  करता  है  और  कैसे  हमे  दृढ़संकल्पी  बनाता  है,  तो  ये  सारी  रचनाये  छठ पूजा  पर  विश्वास  की  नींव  रखती  है।  किस  तरह  बिना  पानी  तक  पिये  36घण्टो  तक  लोग  व्रत  करते  है  और  वो  भी  पूरी  फुर्ती  और  खुशी  से... तो  इसको  हम  क्या  कहेंगे। छठ  पूजा  अपने  आप  मे  बहुत  ही  शक्तिशाली,  विश्वास  से  भरपूर  और  हर  ऊँच-नीच  से  परे  है।

छठ  पूजा  ना  भी  होती  हो  फिर  भी  सिर्फ  अपने  विश्वास  से  आप  छठ माँ  का  आशीर्वाद  पा  सकते  है🙏🙏🙏

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

Engineering aur pyaar (3)

                            मुलाकात... यू  तो  हर  कोई  हर  किसी  के  लिए  अलग  ही  होता  है  पर  कोई  किसी  का  खास  तब  ही  बनता  है  जब  वो  खास  बनना  चाहता  है । ~~~          अब  सारी  मस्तियों  के  बीच  सर्दियों  ने  दस्तक  दे  दी  थी  और  साथ  ही  सेमेस्टर  भी  हमारे  करीब  आ  गया  था,  और  तैयारी  के  नाम  पर  मैंने  सिर्फ  प्यार  की  कविताएं  ही  लिखी  थी।  अब  जब  भी  पढ़ने  बैठता  तो  दिमाग  के  साथ  कि  गयी  थोड़ी  जोर-जबरजस्ती  काम  आ  जाती  जिससे  कुछ  देर  तो  मैं  पढ़  लेता  पर  थोड़ी  ही  देर  बाद  उसका  चेहरा ,   उसकी  आंखें ,   उसकी  हंसी  सब  जैसे  मेरी  किताबो  में  छप  गया  हो।  अब  ये  समझ  आने  लगा  था  कि  क्यों  हमे  प्यार-मोहब्बक्त  से  दूर  रहने  को  कहा  जाता  है।  कॉपी  पर  सवाल  लगाते  लगाते  कब  पेन  को  उस  कॉपी  पर  घुमाने  लग  जाता  था  कुछ  पता  ही  नही  होता  था।                 तो  अब  मैंने  तय  किया  था  कि  ये  सब  से  ध्यान  हटाना  है ।   वैसे  तो  मुझे  अकेले  पढ़ने  की  आदत  थी ,   पर  अब  मैंने  दोस्तो  के  साथ  पढ़ना  शुरू  कर  दिया।  जैसे-तै

मेरी अनकही कहानी(4)

       वो  आखिरी  पल chapter(4)                       Last chapter               कई  बार  मोहब्बक्त  में  गलतफहमियां  हो  जाती  है,  और  उस  एक  गलतफहमी  का  मुआवजा  हम  पूरी  जिंदगी  भरते  है।...  अक्सर  सफर  और  मंज़िल के  बीच  मे  ही  प्यार  दम  तोड़  देता  है  और  यही  अधूरी  कहानियां  ही  हमारे  सफर  को  खूबसूरत  बनाती  है...  कुछ  ऐसी  ही  अधूरी  कहानी  है  मेरी  जिसे  एक  हसीन  मुकाम  देकर  छोड़  दिया  मैंने  और  आजतक  उस  मोहब्बक्त  को  ना  सही  पर  उस  एक  पल  को  यादकर  जरूर  मुस्कुराता  हूं,  जब  सच  मे  मुझे  एहसास  हुआ  कि  शायद  यही  प्यार  है। प्यार  ढूंढने  में  उतना  वक़्त  नही  लगता  जनाब!  जितना  उसे  समझने  और  समझाने  में  लगता  है।। मैं  बता  रहा  था  कि  अब  हमारी  मुलाकाते  बढ़ने  लगी  थी,  अब  अक्सर  कहू  तो  हम  हर  दूसरे  दिन  मिलते  थे।  खूब  सारी  बाते  होती  थी,  वो  मुझे  अपने  बारे  में  बताती  और  मैं  उसे  उसके  ही  बारे  में  बताता।...                         वो  कहती  कि  बहुत  बोलती  हु  ना  मैं!  मैं  कहता  तुम्हारा  खामोश  रहना  च

Engineering Aur Pyaar (1)

        कॉलेज  का  पहला  दिन... (Chapter-1)                        आज  मेरा  कॉलेज  का  पहला  दिन  था...  हर  कोई  जब  पहले  दिन  कॉलेज  जाता  है  तो  ना  जाने  कितना  उत्साह  अंदर  उमड़ता  रहता  है।  सबकुछ  पाने  की  सबकुछ  देखने  की  और  बहुत  कुछ  करने  की  इच्छाएं  मन  मे  जगह  बनाती  है  और  हम  थोड़ा  डरते  भी  है... और  साथ  ही  ऐसा  लगता  है  जैसे  आसमान  में  हो  क्योंकि  अब  जाकर  पहली  बार  हम  अपने  घर  से  कही  दूर  आये  होते  है...         ऐसा  ही  कुछ  हाल  था  मेरा  आज  वो  पहला  दिन  है  जब  मैं  सच  मे  कुछ  बनने  का  सोचने  की  जगह  कुछ  बनने  की  कोशिश  करने  जा  रहा  था...   और  शायद  ये  मेरी  जिंदगी  का  पहला  ऐसा  कदम  था,  जहाँ  से  अब  सारे  रास्ते  मुझे  खुद  ही  तय  करने  थे। कॉलेज  शुरू  होने  के  2दिन  पहले  ही  मैंने  कमरा  ले  लिया  था,  हम  दो  दोस्त  साथ  ही  आये  थे  लेकिन  उसने  c.s  चुना  और  मैंने  मैकेनिकल ....  वैसे  तो  कॉलेज  में  दाखिले  के  लिए  2...3  बार  आ  चुके  थे।                      लेकिन  वो  पहला  दिन,  जब  कंधे  पर  एक  बैग