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Jindgi Aur Sapne (part-3)


#मंज़िल

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कई  बार  हमें  अपनी  मंज़िल  पता  नही  होती  है,  पर  फिर  भी  हम  चलते  रहते  है  लेकिन  कहि  न  कही  रास्ते  के  किसी  मोड़  पर  जब  हम  कुछ  पल  के  लिए  रुकते  है,  तब  ख्याल  आता  है  कि  लोगो  को  देखकर  ये  जो  रास्ता  चुना  है  मैंने  क्या  इन  रास्तों  पर  चलते  हुए  कोई  मुझे  मुझ  जैसे  मिलेगा  या  फिर  शायद  एक  रोज़  इन  बेमन  के  रास्तों  पर  चलते-चलते  मैं  खुद  का  वजूद  कहि  खो  दूंगा  और  एक  दिन  शायद  किसी  मंज़िल  तक  मैं  पहुच  भी  जाऊं  लेकिन  अगले  ही  पल  मुझे  खुद  को  ढूंढना  होगा।


मंज़िल  से  भटके  हुए  इंसान  पर  आधारित  एक  कविता  कृपया  इसे  पूरा  अवश्य  पढ़ें! धन्यवाद🙏

~~~

मैं  तलाश  में  हू  खुद  के  ढूंढता  हू दर-ब-दर  अपने  ही  निशान!
कभी  ख्यालो  के  पीछे  ढूंढता  हू  खुद  को,
कभी  दरवाज़े  के  पीछे  तलाशता  हू!
किसी  आवाज़  का  पीछा  कर  लेता  हूं  यूही  कभी,
कभी  लाख  चिल्लाने  पर  भी  सन्नाटा  पसरा  रहता  है!
ना  जाने  कहा  खो  दिया  मैंने  खुद  को!
कभी  परछाइयों  के  पीछे  भागता  हू,
कभी  आईने  में  तलाशता  हू  खुद  को!
कभी  अंधेरो  में  उजाले  की  तलाश  रहती  है,
तो  कभी  अंधेरा  ही  सुकून  देता  है  मुझको!
कभी  रास्तो  पर  रुककर  इंतज़ार  कर  लेता  हूं,
कभी  यूही  बैठकर  घण्टो  बिता  देता  हूं!
कभी  सुलझा  सा  महसूस  करता  हू  मैं,
तो  कभी  बिन  मतलब  ही  उलझनों  में  पड़  जाता  हूं  मैं!
ना  जाने  क्यों  अब  ऐसे  रहता  हूं,
जैसे  खुद  को  खो  दिया  हो  कहि  पर,
जैसे  किसी  पेड़  की  साख  से  टूटा  हुआ  कोई  पत्ता  हू  मैं,
या  आसमान  से  जमीन  पर  गिरकर  वजूद  खो  दे  ऐसी  बारिश,
जैसे  रास्ते  मे  गिरी  कोई  ठोकर  सा  हू  मैं,
या  आंखों  से  बहती  कोई  नाउम्मीदी  की  आस!
ना  जाने  कौन  हूं  मैं,
जैसे  बेमतलब  सा  बहता  कोई  किनारा  हू  मैं,
जैसे  किसी  के  काम  ना  आ  सके  ऐसा  खारा  पानी!
यू  तो  किसी  काम  आ  भी  जाता  मैं  गर  चुनी  होती  खुद  की  कहानी,
पर  रास्ते  मंज़िल  सब  चुन  लिया  मैंने  सुनकर  औरो  की  जुबानी!
अब  ठोकरे  और  धूल  भरे  रास्ते  है  सामने,
रुक  जाऊ  तो  पिछड़  जाऊंगा  मैं  जो  चलूंगा  तो  किधर  जाऊंगा  मैं!
अब  चौराहे  पर  खड़ा  बस  यही  सोचता  हूं,
अब  चौराहे  पर  खड़ा  यही  सोचता  हूं!
की  खुद  तो  फस  गए  पर  औरो  को  ये बताऊंगा  मैं,
खुद  की  मंज़िल  तय  कर  के  आगे  उसी  पर  तुम  बढ़ना,
वरना  जीवन  भर  होगा  भीड़  के  पीछे-पीछे  चलना!

तो  याद  रहे  अपनी  पहचान  अपने  चुने  रास्ते  पर  ही  होती  है,  और  हो  सकता  है  की  एक  समय  पर  हमें  अपना  चुना  रास्ता  गलत  लगे,  लेकिन  फिर  भी  हमे  उसे  छोड़ना  नही  चाहिए  क्योंकि  उसे  हमने  खुद  से  खुद  के  लिए  चुना  है।  अगर  वो  सही  नही  हुआ  तो  उसे  सही  करने  की  जिम्मेदारी  भी  हमारी  ही  है,  पर  घबराकर  पीछे  हटना  कभी  सही  नही  हो  सकता। क्योंकि  अपने  तय  किये  रास्तो  पर  चलकर  जब  हम  मंज़िल  पर  पहुचते  है,  तो  भले  ही  हम  कितने  भी  साधारण  क्यों  न  हो  उस  जगह  के  लिए  बेहतरीन  होते  है। इसलिए,  जिंदगी  में  एक  लक्ष्य  का  होना  बहुत  जरूरी  है,  क्योंकि  बिना  लक्ष्य  के  हम  अपना  वजूद  और  काबिलियत  दोनों  गवा  देते  है।।।  ...

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