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Engineering Aur Pyaar (8) The End!


Chapter-8
                 आने वाला कल(The End)


     कई  बार  जब  हम  किसी  के  साथ  होते  है  या  जब  कोई  हमारा  बहुत  खास  बन  जाता  है,  तो  हमें  लगने  लगता  है  की  अब  यहां  से  हम  उसके  बिना  रह  नही  सकते  पर  जिंदगी  को  सुलझाने  में  हम  इतने  उलझ  जाते  है  कि  कुछ  तो  खुद  ही  भूल  जाते  है  हम  और  कुछ  भूल  जाने  का  नाटक  करते  है।


          कॉलेज  के  फेयरवेल  के  कुछ  दिन  बाद  ही  हमारी  परीक्षाएं  शुरू  हो  गयी  थी,  क्योंकि  दोनों  की  परीक्षाएं  अलग  अलग  जगह  पर  थी  इसलिए  मुलाकात  नही  हो  पाती  थी।  सभी  को  इंतज़ार  था  कि  जैसे-तैसे  ये  सब  खत्म  हो  और  छुट्टियों  में  घर  जाया  जाए।  पर  इस  बार  मैं  नही  चाहता  था  कि  ये  परीक्षाएं  ये  दिन  खत्म  हो,  मैं  जैसे  समय  को  रोकने  की  सोच  में  था।  पर  ऐसा  मुमकिन  ना  था  और  हमारे  प्रैक्टिकल्स  वगैरह  सब  खत्म  हो  गए  और  2 महीने  की  छुट्टियां  हो  गयी  सब  अपने  अपने  घरों  को  चल  दिये  पर  मैं  बहाने  सोचने  में  था  लेकिन  उस  साल  हमारी  ट्रेनिंग  होनी  थी  तो  मुझे  मजबूरी  में  जाना  ही  पड़ता  तब  उसने  मुझे  बताया  कि  अभी  वो  मेरे  आने  तक  यही  रहेगी। 

अब  हमदोनो  के  बीच  मे  फिलहाल  वो  फोन  ही  होता  था  जिसके  जरिये  हमने  दूरियों  को  अपनाने  की  आदत  डालनी  शुरू  कर  दी  थी... वैसे  तो  वो  बहुत  समझदार  थी  पर  कभी  कभी  कुछ  बातों  पर  वो  रो  दिया  करती  थी  और  अपनी  आंखों  में  आंसू  भरकर  मैं  उसे  हँसाने  की  कोसिस  किया  करता  थाकभी  वो  मुझसे  दूर  ना  रह  पाने  की  बाते  करती  कभी  मैं  उसे  आने  वाले  हर  कल  में  हम  साथ  होंगे  ये  भरोसा  दिलाता।  

कुछ  ऐसे  ही  बातों  और  वादों  के  साथ  वो  पल  बीतता  जा  रहा  था,  तभी  एक  दिन  उसने  मुझे  बताया  कि  आज  प्लेसमेंट  कंपनी  से  कॉल  आया  था,  उन्होंने  टिकट  मेल  किया  है  2 दिन  बाद  ही  बैंगलोर  जाना  होगा।  मैंने  उससे  कहा  ठीक  है  मैं  भी  टिकट  देखता  हूं,  चलो  तुम्हे  पहुचाकर  आ  जाऊंगा  पर  उसने  बताया  कि  उसके  पापा  जा  रहे  है  साथ  मे।  उसकी  ट्रेन  रात  को  10  बजे  थी  तो  मैं  जैसे  तैसे  उसके  जाने  वाले  दिन  8 बजे  ही  स्टेशन  पहुँच  गया।  वो  आयी  और  मैं  दूर  से  ही  उसे  देखता  रहा  हमदोनो  ने  एकदूसरे  से  ये  वादा  कर  रखा  था  कि  मुस्कुराते  रहेंगे  पर  वो  पल  भी  कितना  बेरहम  सा  था  कि  हम  एकदम  करीब  होकर  भी  बहुत  दूर  थे  और  देखते  ही  देखते  वो  ट्रेन  मेरी  नज़रो  से  ओझल  हो  गयी।  उस  पूरी  रात  मैं  उस  बेंच  पर  ही  बैठा  रहा  जहां  बैठकर  वो  मुझे  देखते  हुए  बिना  आंसू  बहाए  मुस्कराते  हुए  रो  रही  थी।  पर  अब  वो  फोन  की  आदत  काम  आने  लगी  थी  जो  इन  2महीनों  में  हमने  लगाई  थी।


कुछ  दिनों  के  बाद  कॉलेज  फिर  से  खुल  तो  गए  पर  कॉलेज  जाने  का  बहाना  अब  मुझसे  दूर  जा  चुका  था  तो  अब  कॉलेज  कम  ही  जाता  था  मैं।  कॉलेज  का  मेरा  आखिरी  साल  खत्म  होने  को  था  लगभग  हम  सभी  दोस्तों  को  कॉलेज  के  कैंपस  से  जॉब  मिल  गयी  थी,  पर  साथ  कोई  नही  था  सभी  को  अलग-अलग  जगहों  पर  जाना  था।  पूरे  1  साल  हो  चुके  थे  हम  दोनों  की  मुलाकात  नही  हुई  थी...
वो  इस  पूरे  साल  में  सिर्फ  1  बार  ही  घर  आयी  थी  और  तब  ही  मैं  कुछ  जरूरी  काम  से  घर  गया  हुआ  था  तो  मुलाकात  नही  हो  पाई  थी।  कई  बार  वो  मुझसे  मिलने  आना  चाहती  थी  और  कई  बार  मुझे  बुलाना  चाहती  थी  पर  हर  बार  कुछ  न  कुछ  बीच  मे  आ  जाता।  अब  कॉलेज  खत्म  के  बाद  और  जॉब  पर  जाने  के  बीच  मे  लगभग  1 महीने  का  वक़्त  था  तो  मैं  बिना  उसे  बताए  ही  उससे  मिलने  चला  गया।  पहली  बार  मैं  उसे  कोई  सरप्राइज  देने  वाला  था,  चूंकि  उसने  मुझे  वहां  के  चप्पे चप्पे  के  बारे  में  बताया  था  तो  मैं  सुबह  पहुचकर  शाम  को  उसके  आफिस  के  पते  पर  पहुचकर  नीचे  ही  उसका  इंतजार  करने  लगा।। 


    उसने  जब  नीचे  मुझे  देखा,  तो  क्या  बताऊ  की  उसके  चेहरे  पर  कितनी  खुशी  थी...  मैंने  इससे  पहले  कभी  उसे  इतना  खुश  होते  नही  देखा  था।  उसे  इस  तरह  खुश  देखकर  मेरी  खुशी  का  भी  ठिकाना  नही  था।  उसने  आफिस  से  2 दिन  की  छुट्टी  ली।  वो  2 दिन  उस  पूरे  1  साल  के  सब्र  का  वो  पड़ाव  था,  जहाँ  से  कुछ  खूबसूरत  पलो  को  समेटकर  हमे  फिर  से  दूर  होना  था।  तो  हमने  उन  2 दिनों  में  हर  उस  लम्हे  को  जीया  जो  हमारी  1 साल  की  दूरी  के  दर्द  को  खत्म  कर  हमें  एकदूसरे  के  करीब  लाने  के  लिए  काफी  था।  पर  ये  2दिन  कुछ  इतनी  जल्दी  बीत  गया  जैसे  वक़्त  की  दुश्मनी  हो  हमसे।  जब  इन  पलो  को  समेटकर  मुझे  निकलना  हुआ  तो  उसने  मुझसे  कहा...
1 दिन  और  क्यों  नही  रुक  जाते।  मैंने  कहा  क्या  हुआ? 
उसने  कहा  ऐसा  लग  रहा  है  जैसे  कुछ  अधूरा  सा  रह  गया  है  प्लीज  1 दिन  और  रुक  जाओ...  मैंने  उससे  कहा  कि  कुछ  अधूरा  रहना  भी  जरूरी  होता  है
उसने  कहा  तुम  अपना  ज्ञान  अपने  पास  रखो  मुझे  नही  सुनना  है।  मैंने  उससे  कहा  कि  फिर  मिलने  का  कोई  बहाना  तो  रहना  चाहिए  न। 
उसने  कहा  बहानो  की  जरूरत  पड़ेगी  क्या  मिलने  के  लिए,  मैंने  कहा  नही  बहाने  जरूरी  तो  नही  है  पर  होते  है  तो  जल्दबाज़ी  जरूर  होती  है  मिलने  की।
         वो  मेरे  साथ  स्टेशन  तक  आयी  थी,  गले  लगकर  उसके  माथे  को  चूमकर  एक  लम्बे  वादे  के  साथ  मैं  ट्रेन  पर  चढ़  गया।  उस  वक़्त  उस  ट्रेन  की  धीमी  रफ्तार  और  कुछ  उसी  रफ्तार  से  उसकी  आंखों  से  निकलते  आंसू  और  बीच  मे  उस  ट्रेन  के  दरवाजे  पर  खड़ा  मैं  बस  यही  सोच  रहा  था  कि  वक़्त  के  आगे  जिंदगी  से  समझौता  करना  ही  पड़ता  है,  कुछ  भी  हमेसा  नही  रहता  है  और  कुछ  इसी  सोच  में  उसे  देखते  देखते  कब  ट्रेन  मोड़  से  गुजरी  और  वो  एकबार  फिर  मेरी  नजरो  से  ओझल  हो  गयी।

  मैं  घर  गया  और  कुछ  दिन  बाद  ही  कलकत्ता  अपने  जॉब  पर  चला  गया,  हमारी  बाते  रोज़  होती  थी  हम  एकदूसरे  को  अपने  काम  अपनी  प्रॉब्लम्स  सब  बताते  थे।  उसका  टाइम  फिक्स  था  सुबह 10 से 6  चूंकि  मैं  कंस्ट्रक्शन  फील्ड  में  था  तो  मेरे  काम  का  कोई  वक़्त  नही  था,  दूसरे  काम  सीखने  की  जल्दी  और  साइट  का  लोड  भी  बहुत  रहने  लगा  था  तो  कई  बार  बाते  कम  होती  थी  और  वो  समझती  भी  थी।  धीरे  धीरे  मुलाकातों  की  तरह  ही  बातों  का  भी  सिलसिला  कम  होने  लगा  था  और  प्यार  और  समझदारी  में  झगड़े  और  गुस्से  ने  अपनी  जगह  बना  ली  थी।  काम  कहू  या  पैसा  और  पोजीशन  पाने  की  जल्दी,  मैं  उसे  धीरे  धीरे  अनजाने  में  अपने  से  दूर  करने  लगा  और  फिर  क्या  एक  दिन  झगड़े  ने  ऐसा  रूप  धारण  किया  जिसमें  गुस्से  ने  अपनी  हदे  पार  कर  दी,  उस  झगड़े  में  हमने  एकदूसरे  से  ना  बात  करने  की  कसम  खा  ली  और  ना  जाने  किस  जुनून  में  मैं  था  कि  एक  पल  के  लिए  भी  उसके  जाने  का  गम  नही  हुआ।

After 4 years (4 साल के बाद)


        इन  4सालो  में  मैं  बहुत  बदल  चुका  था।   मैंने  जिस  तरह  से  खुद  को  उससे  दूर  किया  था,  उसके  लिए  खुद  को  कसूरवार  मान  लिया  था  मैंने  और  इन  बीते  सालों  में  मैंने  उसे  याद  करने  के  सारे  बहाने  तक  मिटा  दिए  थे...

उसी  दौरान  हमारे  कॉलेज  का  रीयूनियन  था  और  मेरे  सारे  दोस्त  आ  रहे  थे  और  सभी  ने  जबरदस्ती  मुझे  भी  बुलाया  था,  इतने  सालों  के  बाद  सबसे  मिलकर  ऐसा  लगा  जैसे  जिंदगी  ने  दुबारा  जीने  का  मौका  दिया  है  वहां  पहुचकर  पता  चला  कि  हमारे  सीनियर्स  का  भी  बैच  आया  है  और  साथ  ही  ये  भी  की  वो  नही  आयी  है। 
सबकी  ज़िद्द  पर  मैं  एक  बार  फिर  माइक  के  पीछे  खड़ा  था  पर  काफी  कुछ  बदल  चुका  था  इन  4 सालो  में।  कुछ  कहने  को  था  नही  मेरे  पास  तो  मैंने  अपनी  डायरी  में  लिखे  उन  पन्नो  को  सबके  सामने  रक्खा  जिसे  मैं  खुद  भी  कभी  पढ़ता  नही  हू...

गर  मुमकिन  होता  हर  किसी  को  पा  लेना,  तो  यू  मोहब्बक्त  बदनाम  ना  होती।
सरेआम  बिक  जाते  जिस्मों  को  खरीदने  वाले,  दिल  की  भी  अगर  कोई  कीमत  होती।

मैं  गया  था  एक  रोज़  उसके  ठिकाने  पर  भी,  खुद  को  उसकी  नज़रो  से  छिपाता  भी  रहा  और  चुपके  से  हर  रोज़  उसे  निहारता  भी  रहा।
मोहब्बक्त  आज  भी  जिंदा  है  मेरे  सीने  में  कही,  खुद  को  ये  बताता  भी  रहा  और  सबसे  छिपाता  भी  रहा।
मुझे  मालूम  है  वो  कितना  रोई  होगी  मेरी  जुदाई  में,  ये  खुद  को  जताता  भी  रहा  और  चेहरे  से  मुस्कुराता  भी  रहा।
इंतज़ार  आज  भी  है  मुझे  उस  हसीन  दिलरुबा  का,  खुद  ही  चाहता  भी  रहा  और  उससे  दूर  जाता  भी  रहा।
याद  करता  हूं  हर  रोज़  ही  अपनी  मोहब्बक्त  को  मैं,  खुद  को  बेवफा  बताकर  चुपके  से  मोहब्बक्त...

            और  तभी  वो  हर  बार  की  तरह  अचानक  ही  मेरे  सामने  आ  गयी।  महफ़िल  में  जैसे  सन्नाटा  सा  पसर  गया  और  मैं  जैसे  लड़खड़ा  सा  गया  और  जुबान  जैसे  जब्त  हो  गयी  हो  मेरी। 
आज  भी  वही  साड़ी!  वही  बिंदी!  वही  काजल!  वैसे  ही  बालों  को  खुला  छोड़  रखा  था  उसने।  मैं  स्टेज  से  उतरकर  पीछे  की  तरफ  चला  गया  क्योंकि  खुद  को  संभालना  मुश्किल  सा  लग  रहा  था,  पॉकेट  से  सिगरेट  निकालकर  जलाया  ही  था  मैंने,  की  वो  भी  वहां  आ  गयी  और  आते  ही  जैसे  किसी  हक़  से  मुझसे  बोली  कि  ये  क्या  ये  कब  से  पीने  लगे...  मैं  बोला  जब  से  कमाने  लगा। 
उसने  पूछा  कैसे  हो?  मैंने  कहा  सब  ठीक  है! 
उसने  कहा  मेरी  तरफ  देखोगे  भी  नही  क्या?    मैं  मुस्कुरा  के  बोला  फिर  से  मोहब्बक्त  में  गिरना  नही  चाहता  हूं  मैं।
उसने  कहा  अगर  कहू  की  आज  भी  तुम्हारा  इंतज़ार  करती  हूं  तो  मानोगे?  मैं  फिर  हँसा  और  बोला  कि  जिसके  इंतज़ार  में  तुम  हो  उसे  तो  कब  का  मार  दिया  है  मैंने,  मैं  वो  नही  जिसकी  तुम  बात  कर  रही  हो। 
उसने  कहा  बस  करो  यार  अब  और  नही,  मैं  बोला  कि  अब  बस  में  ही  तो  नही  है  कुछ  भी,  ना  मैं  ना  मेरे  जज़्बात  ना  मेरी  मोहब्बत  और  ना  ये  लम्हा  जिसने  हमे  आज  फिर  एकदूसरे  के  सामने  लाकर  खड़ा  कर  दिया  है।...

वो  बोली  स्टेज  पर  जो  कुछ  कहा  तुमने  मैंने  सब  सुन  लिया  है  उसका  भी  कोई  जवाब  है  तुम्हारे  पास... मैंने  कहा  सवालों  और  जवाबों  से  खुद  को  बहुत  दूर  कर  लिया  है  मैंने,  और  अगर  तुम  मेरी  डायरी  के  पन्नो  पर  अपनी  मोहब्बक्त  तलाश  रही  तो  मैं  कहूंगा  कि  जला  दिया  है  उसे  मैंने... 

अगले  ही  पल  उसकी  आँखों  मे  आंसू  थे। 
उसे  ऐसे  देखकर  मैं  बोला  मुझे  आदत  हो  गयी  है  यार  अब  अकेले  रहने  की  तुम्हे  भी  जरूर  हो  ही  गयी  होगी,  कुछ  भी  शुरू  करके  मैं  फिर  से  जलना  नही  चाहता  हूं।  मैं  खुद  से  बहुत  दूर  निकल  आया  हूं  और  अगर  आ  भी  गया  वापस  तो  आधा-अधूरा  ही  आऊंगा।  इस  रिश्ते  को  खत्म  मैंने  ही  किया  था  और  उसकी  वजह  आज  भी  मेरे  साथ  चलती  है,  आज  भी  उतना  ही  व्यस्त  और  उतना  ही  गुस्सा  है  मुझमे,  अब  तो  खुद  को  भी  वक़्त  देने  के  लिए  वक़्त  नही  रहता  है  मेरे  पास।  तुम  प्लीज  मुझसे  दूर  ही  रहो,  ना  मैं  अब  मोहब्बक्त  कर  सकता  हूं  और  नाही  बेवफाई,  मैं  मोहताज़  हो  चुका  हूं  अपनी  आदतों  का  जिनमे  से  एक  अकेले  रहना  भी  है।
उसने  कहा  मुझे  ये  तो  पता  था  कि  मिलने  का  बहाना  रहे  इसके  लिए  तुम  हर  मुलाकात  में  कुछ  अधूरा  छोड़  देते  थे,  पर  ये  नही  सोचा  था  कि  तुम  मोहब्बक्त  को  भी  अधूरा  ही  छोड़  दोगे
मैंने  कहा  मैं  खुद  ही  पूरा  नही  बचा  हूं  और  तुम  मोहब्बत  की  बात  करती  हो।

खैर  तुम  खयाल  रखना  अपना  बोलते  हुए  मैं  उसे  वही  रोता  हुआ  छोड़कर  एक  बार  फिर  चला  गया।  अब  भी  शायद  उसे   मुझसे  प्यार  रहेगा  लेकिन  इस  बात  की  तस्सली  हो  गयी  थी  मुझे  की  अब  शायद  वो  खुद  को  संभाल  लेगी,  और  शायद  मेरी  गलतफहमी  ही  सही  पर  उसका  मुझसे  दूर  रहना  ही  अच्छा  था। 


कुछ  कहानियां  खुद  खत्म  हो  जाती  है  और  कुछ  को  हमे  खुद  ही  खत्म  करना  पड़ता  है,  क्योंकि  उसके  अंजाम  से  हम  डरते  है।

Comments

  1. Replies
    1. Thank u for this... I'm sure you have a different point of view, so you liked this story too...

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    2. Everybody knows that something’s wrong but nobody knows what’s going on Only you can tell what was the reason you end the such wonderful lovestory

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    3. ऐसा है ना कि कुछ दर्द ऐसे होते है जिन्हें साथ लेकर हम पूरी उम्र जीते है और वो दर्द हमारी मौत से ही खत्म होता है। मैं इस दर्द में हमेसा जीऊंगा, लेकिन उसे अपने साथ जोड़कर उसे इस दर्द का भागीदारी नही बना सकता। क्योंकि उसके दर्द को साथ रखना आसान है लेकिन इस डर में जीना नामुमकिन है की एक बार मैं उसे छोड़ चुका हूं कहि फिर ऐसा कुछ हुआ तो क्या करूँगा मैं।

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  2. I have to ask you only one thing, after so many years if you meet him then you will accept him or Not ?

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    1. काफी कुछ वक्त और हालात पर भी निर्भर करता है।।

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    2. Maybe NO...वक़्त के साथ भरे घाव को अगर कुरेद जाए तो ज्यादा तकलीफ देता है।।।

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