Skip to main content

Posts

Engineering aur pyaar (6)

  Chapter-6                          हसीन मोड़            जीवन  मे  कितनी  ही  बार  अच्छे  वक्त  की  पहचान  उस  वक़्त  के  बीत  जाने  के  बाद  होती  है  लेकिन  बुरा  वक्त  शुरुवात  से  ही  अपने  होने  की  दस्तक  हमारे  कानो  तक  पहुचा  देता  है।  शायद  इसलिए  हम  अच्छे  और  बुरे  वक्त  को  उसकी  पहचान  के  हिसाब  से  जीते  है  और  हर  बार  अच्छे  वक़्त  की  उम्र  छोटी  होती  है  हमारे  लिए  क्योंकि  उसको  पहचानने  में  ही  हम  आधे  से  ज्यादा  वक़्त  को  गवा  चुके  होते  है।  शायद  इसलिए  ही  हर  बार  हमें  अपने  दुखों  का  पड़ला  भारी  लगता  है  सुख  के  तराजू  से।।      कॉलेज  में  मेरे  दो  साल  खत्म  हो  चुके  थे  और  कॉलेज  के  पहले  दिन  से  लेकर  आजतक  में  काफी  कुछ  बदल  चुका  था।  वो  लड़का  जो  अपनी  बातों  को  किसी  से  बताने  की  जगह  अपनी  डायरी  के  पन्नो  को  भरता  था  वो  अब  उन्ही  बातों  को  किस्सों  कहानियों  में  पिरोकर  सभी  को  बेहिचक  सुनाता  है,  वो  लड़का  जो  लड़कियों  से  बात  करने  में  हिचकिचाता  था  अब  वो  एक  लड़की  को  अपने  दिल  का  हाल  सुनाने  लगा  है।..
Recent posts

पतन त्योहारों का!!

  मैंने  पढा  था  कही  की  त्योहार  खुशिया  मनाने  और  गमो  को  भूल  जाने  के  लिए  मनाए  जाते  है,  और  हमारे  यहां  तो  हर  त्योहार  की  अपनी  एक  कहानी  है।  कोई  त्योहार  हमे  सिखाता  है,  बुराई  पर  सदैव  अच्छाई  की  ही  जीत  होती  है  तो  कोई  बताता  है  कि  अधर्म  पर  धर्म  की  विजय  तय  है... ये  सब  पढ़ने  और  समझने  के  बाद  ये  समझ  आता  है  कि  त्योहार  सिर्फ  खुशिया  बाटने  और  हर्षोउल्लास  से  नही  जुड़ा  बल्कि,  ये  हमारे  धर्म  और  संस्कार की  पहचान  कराता  है।  त्योहारों  का  होना  यानी  धर्म  और  संस्कार  का  होना।।  आज  हम  आधुनिकता  के  उस  दौर  से  गुजर  रहे  है,  जहाँ  हम  अपनी  सुख  सुविधाओं  में  अपने  त्योहारों  के  असली   मायने  तक  भूल  गए  है।  मुझे  पता  है  हम  में  से  कितने  है,  जिन्हें  कोई  फर्क  नही  पड़ता  क्योंकि  हम  हर  त्योहार  सोशल  मीडिया  और  व्हाट्सएप्प  पर  स्टेटस  लगाकर  मना  रहे  है,  लेकिन  सोचना  ये  है  कि  कही  ऐसे  ही  हमारी  पहचान  हमारी  संस्कृति  इसी  फोन  में  सिमट  के  ना  रह  जाये।।। बीते  कुछ  दिन  पहले  हमारे  यहां  एक  त्योह

Engineering aur pyaar (5)

  Chapter -5                       तकरार !... अक्सर  ऐसा  होता  है  की  प्यार  एक  नजर  का  मोहताज  होता  है  पर  कई  बार  इसके  मायने  अलग  भी  होते  है... पहली  नज़र  के  प्यार  को  हम  किसी  की  ओर  आकर्षित  होना  कह  सकते  है  पर  जिस  प्यार  की  परिभाषा  पहली  नज़र  से  अलग  होती  है  शायद  वो  आकर्षण  से  कोसो  दूर  होती  है... बस  ये  कहना  है  कि  प्यार  को  प्यार  बनने  का  समय  देना  जरूरी  है  फिर  चाहे  वो  पहली  नज़र  में  हुआ  हो  या  वक़्त  लेकर।। ~~~ उस  मुलाकात  ने  मुझे  सोचने  पर  मजबूर  कर  दिया  था,  साथ  ही  हालात  कुछ  ऐसे  बन  गए  थे  कि  शायद  वो  अब  मेरी  तरफ  देखेगी  भी  नही।  उसकी  नाराज़गी  को  2  ही  दिन  हुए  थे  कि  कॉलेज  के  सीनियर्स  को  ये  पता  लग  गया  था  कि,  मैं  उनके  बैच  की  एक  लड़की  को  परेशान  कर  रहा  हू ।  जिसके  लिए  उन्होंने  मुझे  कॉलेज  की  कैंटीन  में  घेर  लिया  पर  पता  नही  क्यों  बिना  कुछ  बोले  घूरते  हुए  वहां  से  चले  गए।  उस  दिन  छुट्टी  से  कुछ  मिनटो  पहले  ही  मैं  अपने  2  दोस्तो  के  साथ  गेट  से  बाहर  निकला  और 

महिला दिवस ??

                           कभी  कभी  हमारे  कैलेंडर  में  कुछ  ऐसी  तारीख  आती  है  या  कोई  ऐसा  दिन  आता  है  जिससे  हम  पूरी  तरह  सहमति  नही  रखते  है  हमे  लगता  है  कि  नही  ये  एक  दिन  में  सिमट  जाए  ऐसा  सम्मान  नही  है  या  ये  सिर्फ  एक  दिन  नही  पूरे  साल,  साल  के  हर  दिन  होना  चाहिए।  एक  ऐसी  ही  तारीख  है  आज  08मार्च एक  ऐसा  ही  दिन  है  आज Womens's day(महिला दिवस) क्या  ये  दिन  काफी  है  उन  महिलाओं  के  सम्मान  में  जो  इस  पूरे  समाज  की  रूप-रेखा  तय  करती  है,  जिन्हें  इस  धरती  की  सबसे  ताकतवर  प्राणी  होने  के  बाद  भी  सबसे  कमजोर  बताया  जाता  है,  क्या  सच  मे  काफी  है  ये  एक  दिन   उन  महिलाओं  के  लिए  जिन्हें  समाज  और  रीति-रिवाज  के  नाम  की  बेड़ियों  में  बांधकर  रखा  जाता  है  या  उन  महिलाओं  के  लिए  जो  अपना  जिस्म  बेचकर  अपनी  जैसी  ना  जाने  कितनी  महिलाओं  को  हवस  के  शिकारी  कुत्तो  से  बचाती  है।  क्या  सच  मे  इस  एक  दिन  से  उन  सारी  महिलाओं  का  सम्मान  होता  है,  जो  किसी  और  कि  ज़िद  और  गुस्से  का  शिकार  (एसिड अटैक

Jindgi Aur Sapne (part-3)

# मंज़िल ~~~ कई  बार  हमें  अपनी  मंज़िल  पता  नही  होती  है,  पर  फिर  भी  हम  चलते  रहते  है  लेकिन  कहि  न  कही  रास्ते  के  किसी  मोड़  पर  जब  हम  कुछ  पल  के  लिए  रुकते  है,  तब  ख्याल  आता  है  कि  लोगो  को  देखकर  ये  जो  रास्ता  चुना  है  मैंने  क्या  इन  रास्तों  पर  चलते  हुए  कोई  मुझे  मुझ  जैसे  मिलेगा  या  फिर  शायद  एक  रोज़  इन  बेमन  के  रास्तों  पर  चलते-चलते  मैं  खुद  का  वजूद  कहि  खो  दूंगा  और  एक  दिन  शायद  किसी  मंज़िल  तक  मैं  पहुच  भी  जाऊं  लेकिन  अगले  ही  पल  मुझे  खुद  को  ढूंढना  होगा। मंज़िल  से  भटके  हुए  इंसान  पर  आधारित  एक  कविता  कृपया  इसे  पूरा  अवश्य  पढ़ें! धन्यवाद🙏 ~~~ मैं  तलाश  में  हू   खुद  के  ढूंढता  हू दर-ब-दर  अपने  ही  निशान! कभी  ख्यालो  के  पीछे  ढूंढता  हू   खुद  को, कभी  दरवाज़े  के  पीछे  तलाशता  हू ! किसी  आवाज़  का  पीछा  कर  लेता  हूं  यूही  कभी, कभी  लाख  चिल्लाने  पर  भी  सन्नाटा  पसरा  रहता  है! ना  जाने  कहा  खो  दिया  मैंने  खुद  को! कभी  परछाइयों  के  पीछे  भागता  हू , कभी  आईने  में  तलाशता  हू   खुद  को! कभी 

Engineering aur pyaar -4

           कुछ  एक  पल  में  कई  बार  हम  सदियां  जी  लेते  है।         अपनी  मोहब्बक्त  को  करीब  पाकर  हम  यूही  मुस्कुरा  लेते  है। यू  तो  वो  रात  उसके  नाम  की  थी  पर  उस  रात  की  कहानी  लिखने  का  हक़  मेरे  पास  था... मुझे  ये  तो  समझ  आ  चुका  था  कि  मेरी  कहानियों  में  वो  खोने  लगी  है।  वो  तलाशने  लगी  थी  खुद  को  मेरे  हर  लफ्ज़  में,  जैसे  उसे  समझ  आ  गया  था  वो  कॉलेज  वाली  लड़की  कोई  और  नही  बल्कि  वो  खुद  है  और  जिसकी  तारीफ  में  मैं  अपनी  पहचान  तक  भूल  गया  वो  तारीफ  उसी  की  है,  उस  रात  वहां  से  निकलने  से  जरा  पहले  ही  उसकी  और  मेरी  नजरे  टकरायी  और  ऐसा  लगा  जैसे  पलके  एक  बार  से  दूसरी  बार  झपकने  के  बीच  में  जो  वक़्त  लेती  है  वो  वक़्त  वही  ठहर  सा  गया  हो,  जैसे  उस  वक़्त  आस-पास  जो  कुछ  भी  हो  रहा  था  सब  थम  सा  गया  था।  इतने  में  किसी  ने  मुझे  आवाज़  दी  और  मैं  जैसे  किसी  ख्वाब  से  वापस  आया  था,  अब  जैसे  तैसे  उस  पार्टी  को  खत्म  कर  के  मैं  अपने  रूम  पर  पहुचा  पर  उस  कमबख्त  रात  ने  जैसे  ना  गुजरने  का

वर्ष 2020

      इस  साल  का  ये  मेरा  पहला  ब्लॉग  है,  हालांकि  नया  साल  शुरू  हुए  10  दिन  बीत  चुके  है... पर  ब्लॉगिंग  साइट  में  थोड़ी  दिक्कत  की  वजह  से  मैं  असमर्थ  था।  नए  साल  में  बीते  साल  की  कुछ  बाते  लिख  रहा  हू,  उम्मीद  करता  हू  आपको  पसंद  आएगा ~~~ 2020  ने  हमे  कितना  कुछ  है  सिखाया। Work  From  home  और  lockdown  से  लेकर  "रामायण" तक  ट्रेंड  में  है  आया। घर  पर  रहने  की  मजबूरी  कहो  या  माँ  के  हाथ  के  खाने  की  खुशी, ये   पू रा   साल  कई  उतार  चढ़ाव   लेकर  था  आया। इस  पूरे  साल  हम  एक  अलग  ही  दुनिया  मे  जैसे  जी  रहे  हो,  जैसे  बचपन  मे  हमे  घरों  में  बंद  कर  दिया  जाता  था  और  हम  चिल्ला  चिल्लाकर  पूरी  कॉलोनी  को  हिला  देते  थे,  कुछ  वही  हाल  था  हमारा।  पर  अब  वो  चिल्लाना  नही  था  बस  थी  तो  खामोशी,  बेचैनी  और  चैन  से  सांस  ना  ले  पाने  की  फिक्र... थाली  पीटने  से  लेकर  मोमबत्ती  जलाना  भी  देखा  है। चाइना  को  हमने  बॉर्डर  से  पीछे  हटाते  भी  देखा  है। राम  मंदिर  की  नींव  रख  दीवाली  बिन  दिया  जलाया  है 

Engineering aur pyaar (3)

                            मुलाकात... यू  तो  हर  कोई  हर  किसी  के  लिए  अलग  ही  होता  है  पर  कोई  किसी  का  खास  तब  ही  बनता  है  जब  वो  खास  बनना  चाहता  है । ~~~          अब  सारी  मस्तियों  के  बीच  सर्दियों  ने  दस्तक  दे  दी  थी  और  साथ  ही  सेमेस्टर  भी  हमारे  करीब  आ  गया  था,  और  तैयारी  के  नाम  पर  मैंने  सिर्फ  प्यार  की  कविताएं  ही  लिखी  थी।  अब  जब  भी  पढ़ने  बैठता  तो  दिमाग  के  साथ  कि  गयी  थोड़ी  जोर-जबरजस्ती  काम  आ  जाती  जिससे  कुछ  देर  तो  मैं  पढ़  लेता  पर  थोड़ी  ही  देर  बाद  उसका  चेहरा ,   उसकी  आंखें ,   उसकी  हंसी  सब  जैसे  मेरी  किताबो  में  छप  गया  हो।  अब  ये  समझ  आने  लगा  था  कि  क्यों  हमे  प्यार-मोहब्बक्त  से  दूर  रहने  को  कहा  जाता  है।  कॉपी  पर  सवाल  लगाते  लगाते  कब  पेन  को  उस  कॉपी  पर  घुमाने  लग  जाता  था  कुछ  पता  ही  नही  होता  था।                 तो  अब  मैंने  तय  किया  था  कि  ये  सब  से  ध्यान  हटाना  है ।   वैसे  तो  मुझे  अकेले  पढ़ने  की  आदत  थी ,   पर  अब  मैंने  दोस्तो  के  साथ  पढ़ना  शुरू  कर  दिया।  जैसे-तै