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पलायन (मजदूर)

#पलायन

असली  तस्वीर  यही  है  हमारे  देश  की  और  इस  देश  की  नींव  भी  इन्ही  से  है ।

ये  पहचान  है  हमारे  भारत  की  और  हमारे  देश  की  पहचान  भी  इन्ही  से  है ।


मैं  लिख  तो  रहा  हू  पर  कुछ  कह  नही  सकता ।
आंखों  में  आंसू  भरने  के  अलावा  कुछ  कर  नही  सकता ।
वो  गरीब  है  जो  खुद्दारी  से  कमा  कर  खाते  थे ,
अब  कैसे  मान  ले  इतनी  मेहनत  के  बाद  भी,  अब  वो  जी  नही  सकता ।

ना  रहने  को  घर  बचा  है  नाही  खाने  को  खाना ।
ऐसे  में  पलायन  क्यों  ना  करे  एक  गरीब  बेचारा ।
सरकारें  दावा  कर  रही  है  हम  देते  है  सभी  को  खाने  को  रोटी ,
अगर  ऐसा  है  तो  क्यों,  सड़को  पर  फिर  रहा  मजदूरो  का  परिवार  मारा  मारा ।

एक  बीमारी  में  पूरे  देश  का  इतिहास  खुल  कर  सामने  आ  गया ।
किस  नेता  ने  कितना  काम  किया  लोगो  के  लिए ,  सब  निकल  के  आ  गया ।
हमने  गरीबी  खत्म  ना  कि  बस  गरीबी  को  छुपाते  रह  गए ।
एक  बीमारी  की  वजह  से  देश  का  असली  चेहरा  बाहर  आ  गया ।

कुछ  कहने  को  बचा  नही  है  अब  तो ।
कुछ  करने  को  रहा  नही  है  अब  तो ।
एक  घर  बनाने  की  आस  में  निकले  थे  गाँव  से  दूर ,
इस  बीमारी  के  खौफ  में  जीने  की  आस  भी  नही  है  अब  तो ।

कोई  बच्चे  को  गोद  में  लेकर  चल  रहा,  तो  किसी  का  रास्ते  मे  ही  गर्भपात  हो  रहा ।
मन्ज़िल  बहुत  दूर  है  ये  वो  छोटी  बच्ची  भी  जानती  है,  पर  पेट  भरने  के  लिए  ही  तो  उसका  घर  की  ओर  पलायन  हो  रहा ।

हमारे  देश  की  बड़ी  दुखद  कहानी  है ।
यहाँ  गंगा  तो  बहती  है  पर  आज  इन   मजदूरों  की  आंखों  में  भरा  पानी  है ।
ये  बीमारी  तो  उन्हें  बाद  में  मारेगी ,
अभी  तो  लगता  है  जैसे  घर  पहुचने  की  आस  में  मरने  की  बारी  है ।

मरना  तो  है  सभी  को  एक  रोज़  ये  सब  जानते  है ।
पर  मौत  से  पहले  मरना  भी  कौन  चाहते  है ।
बीमारी  फैलाने  वाले  तो  घरो  में  बंद  हो  गए,
जो  पहले  ही  गरीबी  से  लड़  रहे  थे  वो  अब  बस  एक  वक़्त  की  रोटी  मांगते  है ।

कुछ  लोगो  ने  बीमारी  फैलाने  की  हर  तरह  से  कोशिशे  की ,
कुछ  ने  तो  फलों  पर  भी  थूक  है  लगाकर  बेची ,
ये  मजदूर  गरीब  जरूर  है  पर  देशभक्ति  जानते  है ।
इन्होंने  अपने  साथ  किसी  को  भी  नुकसान  पहुचाने  की  कोशिश  नही  की ।

कुछ  तो  पैदल  चल  कर  किसी  हालत  में  घर  पहुच  गए ।
कुछ  बेचारे  घर  पहुचने  की  आस  में  रास्ते  मे  ही  दम  तोड़  गए ।
अब  किससे  करे  शिकायत  किसको  कहे  गलत  हो  तुम ,
वो  गरीब  मजदूर  है  साहब  वो  पलायन  करने  को  मजबूर  हो  गए ।

वो  मजदूर  तो  मेहनत  की  दो  रोटी  कमाता  था  इस  उम्मीद  के  साथ  की  एक  रोज़  कहि  पर  छोटा  सा  आशियाना  बनाकर  खुद  को  और  अपने   परिवार  को  सुरक्षित  करेगा  पर  उसे  क्या  पता  था  कि  जिस  परिवार  की  सुरक्षा  के  लिए  वो  इतनी  कड़ी  मेहनत  कर  रहा  था  उसी  परिवार  को  लेकर  एक  दिन  ना  जाने  कितने  कोश  दूर  नंगे  पांव  ही  चलना  होगा
उन्हें  क्या  पता  था  कि  उनके  इस  हालत  का  भी  कोई  राजनीतिक  पहलू  बन  जायेगा  जिसका  देश  भर  में  सब  मजाक  बना  देंगे ।



Comments

  1. अति सुन्दर

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  2. दिल को छू जाने वाला कड़वा सच।कहीं न कही ये ब्यान होता है कि हम अभी कितने पिछड़े हैं।

    ReplyDelete
    Replies
    1. बिल्कुल सही बात कही है आपने । ये बीमारी हमे खुद में झांकने का मौका दे रही है कि हमे हमेशा सिर्फ जातीवाद में रहकर अपने देश को खाई में धकेलना है, या फिर एकजुट होकर इस देश को उजाले की तरफ ले आना है।

      Delete

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