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पतन त्योहारों का!!


 

मैंने  पढा  था  कही  की  त्योहार  खुशिया  मनाने  और  गमो  को  भूल  जाने  के  लिए  मनाए  जाते  है,  और  हमारे  यहां  तो  हर  त्योहार  की  अपनी  एक  कहानी  है।  कोई  त्योहार  हमे  सिखाता  है,  बुराई  पर  सदैव  अच्छाई  की  ही  जीत  होती  है  तो  कोई  बताता  है  कि  अधर्म  पर  धर्म  की  विजय  तय  है... ये  सब  पढ़ने  और  समझने  के  बाद  ये  समझ  आता  है  कि  त्योहार  सिर्फ  खुशिया  बाटने  और  हर्षोउल्लास  से  नही  जुड़ा  बल्कि,  ये  हमारे  धर्म  और  संस्कार की  पहचान  कराता  है।  त्योहारों  का  होना  यानी  धर्म  और  संस्कार  का  होना।। 

आज  हम  आधुनिकता  के  उस  दौर  से  गुजर  रहे  है,  जहाँ  हम  अपनी  सुख  सुविधाओं  में  अपने  त्योहारों  के  असली   मायने  तक  भूल  गए  है।  मुझे  पता  है  हम  में  से  कितने  है,  जिन्हें  कोई  फर्क  नही  पड़ता  क्योंकि  हम  हर  त्योहार  सोशल  मीडिया  और  व्हाट्सएप्प  पर  स्टेटस  लगाकर  मना  रहे  है,  लेकिन  सोचना  ये  है  कि  कही  ऐसे  ही  हमारी  पहचान  हमारी  संस्कृति  इसी  फोन  में  सिमट  के  ना  रह  जाये।।।

बीते  कुछ  दिन  पहले  हमारे  यहां  एक  त्योहार  मनाया  गया  होली... यू  तो  रंगों  से  भरा  ये  त्योहार  अपने  आप  की  एक  अलग  ही  पहचान  रखता  है।  देश  के  भिन्न  भिन्न  जगहों  पर  भिन्न  भिन्न  तरीको  से  होली  मनाई  जाती  है,  पर  क्या  आप  सभी  ने  इस  त्योहार  में  कुछ  बदलाव  महसूस  किया?  मैंने  किया...  मैंने  देखा  होलिका  के  दिन  लगने  वाला  उपटन  अब  लोगो  को  एलर्जी  देने  लगा  है,  मैंने  देखा  कि  जो  त्योहार  आपसी  रिश्तों  में  रंगों  के  जरिये  मिठास  लाने  का  काम  करता  है,  उसे  हमने  अपनी  झूठी  और  बनावटी  दुनिया  के  रंगों  से  रंग  दिया  है।  जो  त्योहार  होली  मिलन  करना  सिखाता  है,  अब  उस  दिन  कितनो  के  दरवाजे  बंद  रहने  लगे  है।  लोग  अपने  मोबाइल  से  कितनो  को  हैप्पी  होली  का  मैसेज  भेजते  है,  पर  जो  कोई  सच  मे  होली  हैप्पी  करने  आये  तो  रंगों  से  परहेज  करते  है।।  दिखावे  की  समझदारी  में  पहले  पानी  से  होली  खेलना  बंद  कर  दिया  और  अब गुलाल  से  भी  दूर  भागते  है। अब  तो  घर  मे  बने  गुझियां  और  गुलाब जामुन  तक  घर  वालो  को  खुद  ही  खाने  पड़ते  है,  क्योंकि  मेहमान  अब  किसी  बहाने  से  खाने  से  बचने  लगे  है।।

आज  हमारे  हर  त्योहार  का  यही  हाल  है  ...खिचड़ी  जैसे  त्योहार  को  तो  लगता  है  सब  भूल  ही  गए  जहा  पहले  हफ़्तों  से आसमान  पटा  रहता  था  पतंगों  से,  अब  खिचड़ी  के  दिन  भी आसमान  सुना  रहने  लगा  है।  किसी  ने  मांझे  का  सहारा  लेकर  इंसानियत  सीखा  दी  और  त्योहार  बस  किताबो  में  और  मोबाइलो  में  रह  गया। रीति-रिवाजों  को  मानने  की  तो  बात  ही  दूर  है।

दीपावली...  जिस  त्योहार  की  महत्ता  किसी  लिखवाट  की  मोहताज  नही  है,  जो  त्योहार  धार्मिक  और  सांस्कृतिक  दोनों  के  गुणों  को  अपने  अंदर  समेटे  हुए  है  उससे  पूरे  साल  का  प्रदूषण  एक  दिन  में  होता  है  ऐसा  कह-कह  के  लोगो  ने  दीवाली  को  दियो  में  समेट  कर  रख  दिया  है... 
सावन...  के  आते  ही  लोगो  को  दूध  की  बर्बादी  दिखने  लगती  है...
रक्षाबन्धन...  पर  बहने  आजकल  डिजिटल  राखी  बांधने  लगी  है,  क्योंकि  भाई  अपनी  जगह  व्यस्त  है,  बहन  अपनी  जगह... हमे  हमारे  त्योहारों  से  दूर  करने  के  लिए  जो  बहाने  और  वजहें  बतायी  जा  रही  है  उनपर  हम  आंख  मुद  कर  विश्वास  कर  रहे  है  और  जागरूक  और  समझदार  होने  का  दिखावा  कर  रहे  है। इस  दिखावे  की  वजह  से  आज  हम  अपने  त्योहारों  का  वजूद  तक  खोते  जा  रहे  है।।।

हमारे  यहां  लोग  हमारे  गर्न्थो  से  भी  ज्यादा  परिपक्व  और  समझदार  है।  हमने  जाने  अनजाने  त्योहारों  से  कितने  ही  संस्कार  भी  सीखे  है।  जो  हमे  अपने  आप  मे  सभ्य  बनाते  है,  फिर  चाहे  वो  त्योहारों  की  सुबह  माँ-बाबा  का  आशीर्वाद  लेना  हो  या  हर  त्योहार  को  मनाने  के  पहले  के  नियमो  का  पालन  हो  वो  सबकुछ  जो  हमे  अपने  धर्म  से  जोड़ता  है  और  एक  सभ्य  समाज  की  पहचान  कराता  है।  लेकिन  ऐसी  परिस्थितियों  में  हमारी  आने  वाली  पीढ़ी  हमारे  धर्म  और  संस्कार  से  वंचित  हो  जाएगी...  उन्हें  सिर्फ  ये  पता  होने  से  की  त्योहार  क्यों  मनाए  जाते  है,  कोई  फर्क  नही  पड़ेगा  जबतक  उन्हें  ये  पता  नही  होगा  कि  त्योहार  कैसे  मनाए  जाते  है।  ये  क्यों  और  कैसे  के  बीच  का  मेल  हमे  ही  बताना  और  समझाना  होगा,  और  उसके  लिए  इन  त्योहारों  को  ज़िंदा  रखना  आवश्यक  है।

ये  पतन  सिर्फ  त्योहारों  का  नही  है,  ये  पतन  है  हमारे  धर्म  हमारे  समाज  हमारी  संस्कृति  का  और  इन  त्योहारों  का  पतन  हमे  किन  अंधेरो  में  लेकर  जाएगा  इसका  अंदाज़ा  शायद  किसी  को  नही  है।  क्योंकि  कोई  भी  धर्म  और  संस्कृति  तबतक  ही  ज़िंदा  रहती  है  जबतक  उनके  बनाये  हुए  नियम  उस  समाज  मे  बने  रहते  है...  और  ये  फैसला  हमे  करना  है  कि  हम  अपनी  पीढ़ियों  को  धर्मविहीन  और  संस्कारविहीन  समाज  देना  चाहते  है,  या  फिर  एक  स्वर्णिम  और  सबसे  उच्च  स्थान  रखने  वाली  संस्कृति!! 


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Comments

  1. AchA hai , lekin aur jaise muslamano ka eid, aur sikh ke bhi tyohar ke baare me likhna

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    Replies
    1. Idea to accha h btt mujhe maalum nhi h iske baare me kuch bhi... I will try🤗

      Delete
  2. Absolutely correct..We never feel ashamed celebrating New Year, Valentine's Day, Frendship Day or applying cake on the face but we feel ashamed celebrating our holy festivals. Everybody knows India is popularly known as festival's land. Different type of cultures and religions celebrate diffrent type of festivals over here. And surely we are losing our identity, our pride, our culture, our religion and even our India by decreasing the number of celebration of our holy festivals.

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