Skip to main content

Engineering Aur Pyaar (7)

 


Chapter-7
                  ख्वाहिशे


                 कोशिशें  कितनी  भी  कर  ले  पर  ख्वाहिशें  अक्सर  अधूरी  रह  ही  जाती  है  क्योंकि  ख्वाहिशो  का  काम  है  वक़्त  के  साथ   बदलते  रहना  और  वक़्त  पर  गर  कोई  ख्वाहिश  पूरी  हो  जाये  तो  तुरंत  ही  हम  उसके  आगे  की  किसी  ख्वाहिश  को  साथ  जोड़  लेते  है।  ख्वाहिश  और  जिंदगी  का  एक  अनदेखा  सा  रिश्ता  है  जो  वक़्त  के  साथ  जिंदगी  जीने  का  जरिया  भी  बन  जाता  है।



देखते  ही  देखते  वो  वक़्त  एकदम  से  करीब  आकर  खड़ा  था  जिसमे  मुझे  उस  लम्हे  से  होकर  गुजरना  था  जिसकी  चाहत  जिसकी  उम्मीद  तक  मैंने  नही  की  थी,  जब  ये  शुरू  हुआ  तब  सिर्फ  कुछ  ख्वाइशें  ही  थी  जो  इस  रिश्ते  से  जुड़ी  थी  पर  ये  लम्हा  जिसका अभी  से  पहले  कभी  ख्याल  तक  नही  आया  था  ये  शुरुवात  से  साथ  ही  था।  बस  दिल  मे  भरी  मोहब्बक्त  कहो  या  समझ  का  हेर-फेर  इस  लम्हे  को  अभी  से  पहले  ना  मैं  सोच  पाया  था  और  नाही  इसके  लिए  मैं  तैयार  था।  वैसे  तो  उसके  जाने  में  अभी  4...  6  महीने  का  वक़्त  था  पर  ऐसा  महसूस  होने  लगा  था  कि  हम  अभी  से  दूर  हो  रहे  है।  हमे  पता  तो  था  कि  मोहब्बक्त  दूरियों  की  मोहताज  नही  है,  एकदूसरे  से  सिर्फ  मिल  ना  पाने  से  किसी  रिश्ते  के  खत्म  होने  का  कोई  सवाल  ही  नही  खड़ा  होता,  लेकिन  ये  सब  जानते  हुए  भी  एक  अजीब  सा  डर  दिल  मे  घर  कर  गया  था  शायद  सबकुछ  जानते  हुए  भी  हम  मायूस  थे,  दूरियों  ने  डरा  दिया  था  हमे  और  ये  जो  कुछ  भी  था  हम  दोनों  के  लिए  पहली  बार  था। 


     दिमाग  मे  चल  रही  सारी  उलझने  चेहरे  पर  नजर  आने  लगी  थी,  हम  हर  कॉल  पर  एकदूसरे  से  सिर्फ  यही  कहते  रहते  की  सबकुछ  अच्छा  ही  होगा... कभी  मुझे  वो  समझाती  की  हम  मिलते  रहेंगे  कभी  मैं  उससे  कहता  कि  तुम्हे  जब  भी  मेरी  जरूरत  होगी  मैं  आ  जाऊंगा।  ऐसे  ही  कुछ  वादों  के  बीच  उसकी  बिदाई  का  वक़्त  आ  गया  मेरा  मतलब  है  कि  कॉलेज  का  फेयरवेल!  अब  कॉलेज  का  फेयरवेल  था  तो  बिना  कहे  मेरा  परफॉरमेंस  तय  हो  गया  था,  मुझे  क्या  बोलना  है  कुछ  पता  नही  नाही  मैंने  कोई  तैयारी  की  थी  और  नाही  कुछ  लिखा  था  मैंने  उस  दिन  से  पहले  की  पूरी  रात  जागते  हुए  काटी  थी...   मुझे  याद  है  वो  तारीख  5dec.. 

वो  जानती  थी  कि  वो  मुझे  साड़ी  में  पसन्द  है  तो  उसने  कॉलेज  आने  से  पहले  मुझसे  पूछा  कि  "आज  किस  रंग  की  साड़ी  पहनकर  आऊँ ?"  मैंने  उससे  कहा  "वैसे  तो  तुम  हर  रंग  में  जचती  हो  पर  आज  कुछ  ऐसा  पहनना  जो  तुमपर  जचे।"  वो  समझ  गयी  और  वो  बोली  "क्या  हुआ  मूड  अच्छा  नही  है?",  मैं  बोले  "तुम्हे  देखते  ही  सब  ठीक  हो  जाएगा।"

कॉलेज  का  प्रोग्राम  शुरू  होने  के  आधे  घण्टे  बाद  तक  वो  नही  आयी  थी  और  मैं  कॉलेज  के  पीछे  कैंपस  में  उसका  इंतजार  करते  हुए  पागलो  की  तरह  उसे  कॉल  पर  कॉल  कर  रहा  था  क्योंकि  उसने  कहा  था  कि  पहले  मुझसे  मिलेगी  तब  भीड़  में  जाएगी  तभी  अचानक  सामने  से  वो  आयी  उसने  पीले  या  कहू  की  हल्दी  वाले  रंग  की  साड़ी  पहनी  हुई  थी  वो  भी  सिंपल  सी  और  माथे  पर  एक  छोटी  सी  बिंदी  के  साथ  आंखों  का  वो  काजल  जैसे  सिर्फ  मुझे  रिझाने  के  लिए  ही  उसने  लगाया  था  और  बालों  को  युही  खुला  छोड़  रखा  था  उसने,  वो  बिल्कुल  वैसे  ही  तैयार  होकर  आयी  थी  जैसे  मुझे  वो  पसंद  थी।  मैं  उसे  अपनी  आंखों  में  कैद  कर  ही  रहा  था  की  उसने  मुझे  कस  के  गले  से  लगा  लिया  और  धीरे  से  कानो  में  बोली  कि  आज  तुम  बहुत  अच्छे  लग  रहे  हो  हमेसा  ऐसे  ही  फॉर्मल  कपड़े  पहना  करो  और  मेरे  गालो  को  खिंचते  हुए  वहां  से  चली  गयी।  मैं  उसे  ये  भी  नही  कह  पाया  कि  अपने  गर्दन  पर  एक  काला  टीका  लगा  ले  उसे  आज  कही  मेरी  ही  नजर  ना  लग  जाये। 



         अपना  होश  सम्भालते  हुए  जैसे  तैसे  मैं  महफ़िल  में  पहुचा  और  तभी  मुझे  स्टेज  पर  बुला  लिया  गया  वो  मेरे  एकदम  सामने  ही  बैठी  थी  और  उसे  आज  देखकर  ऐसा  लग  रहा  था  जैसे  उसे  आज  पहली  बार  देखकर  मैं  फिर  से  उसके  प्यार  में  पड़  रहा  हू,  तबतक  किसी  ने  आवाज़  दी  भाई  माइक  पर  बोलना  होता  है।  जैसे  तैसे  उससे  नज़रे  हटाकर  मैंने  बोलना  शुरू  किया।  
सीनियर्स  की  कुछ  तारीफों  के  बाद  मैंने  कहा  वैसे  तो  आज  कुछ  बोलने  के  लिए  मेरे  पास  है  नही  फिर  भी  ये  शाम  वीरान  नही  होनी  चाहिए।
मैंने  आज  शुरुवात  शायरी  से  की  मैंने  कहा :-

हमे  खबर  है  कि  एक  रोज़  बिछड़  जाना  है।
पर  इस  दिल  को  क्या  खबर  कब  किधर  जाना  है।

कॉलेज  के  पहले  दिन  वाली  सीनियर्स  से  मुलाक़ात  हमेसा  याद  रहती  है,
पर  असल  जिंदगी  की  काफी  समझ  हमे रैगिंग  से  भी  मिलती  है
शुरुवात  में  सभी  मतलबी  और  घमंडी  से  लगते  है,
पर  कॉलेज  के  हर  प्रॉब्लम  में  सभी  साथ  खड़े  होते  है
इन  4 सालो  में  कितनी  जिंदगी  जीयी होगी  सबने,
किसी  ने  जीवन  भर  साथ  देने  वाले  खास  दोस्त  बनाये  होंगे,
तो  मोहब्बक्त  भी  जरूर  एकतरफा  की  होगी  किसी  ने
सेमेस्टर  वाले  साल  बड़ी  जल्दी  गुजर  गए  यारो  के  साथ,
अब  कैसे  गुजरेगी  जिंदगी  कितने  तो  इस  सोच  में  पड़े  होंगे
भले  ही  हर  कोई  वादा  कर  रहा  है  एक  दूसरे  से  साल  में  1  बार  मिलने  का,
पर  दिल  के  किसी  कोने  में  एक  झिझक  है  ऐसा  ना  होने  का
नामुमकिन  सी  कोशिशें  करेंगे  सभी  जुड़ाव  बना  रहे  आपस  मे,
पर  ये  जिंदगी  और  दुनिया  ब्यस्त  रखेगी  पैसे  की  लालच  में
जिंदगी  खत्म  हो  जाती  है  पर  रिश्ते  चलते  रहते  है,
दिल  के  किसी  कोने  में  उम्र  भर  ये  4  साल  दबे  रहते  है
कॉलेज  की  लड़ाइयां  और  क्लास  बंक  वाली  आदते  याद  रहती  है
एक  उम्र  बीतने  के  बाद  यही  शरारते  हमारी  किस्सों  कहानियों  में  रहती  है
हर  किसी  को  हम  जिंदगी  जीने  की  सिख  देते  है
क्योंकि  हम  इंजीनियर्स  हर  उतार-चढ़ाव  से  परे  होते  है।।।

                कुछ  ऐसे  ही  2...  4  स्पीच  के  बाद  आखिरकार  आंखों  में  गम  रख  चेहरे  से  मुस्कुराते  हुए  सभी  ने  एकदूसरे  से  अलविदा  कहा  और  कुछ  इस  तरह  यादों  की  गठरी  बांधकर  सभी  ने  उसे  अपने  कंधे  पर  चढ़ा  लिया  और  आगे  दिखने  वाले  एक  लंबे  रास्ते  पर  उन  यादों  को  दिल  बहलाने  का  जरिया  बना  लिया।

       ये  सब  खत्म  होने  के  बाद  सभी  ने  भोजन  शुरू  किया  तभी  उसने  मुझे  कॉल  किया  और  कॉलेज  की  छत  पर  बुलाया  ऊपर  पहुचते  ही  मैंने  देखा  कि  वो  मुस्कुराने  की  नामुमकिन  सी  कोशिश  में  असफल  हो  रही  थी  तभी  मेरी  नजर  उसके  होठो  के  उस  काले  निशान  पर  गयी  जिसे  उसने  मेरे  कहने  पर  लगाया  था... मैं  उसके  करीब  गया  और  उससे  कहा  कि  "आखिरकार  ये  भी  खत्म  हुआ  अब  तुम्हे  जाना  ही  है  और  वहां  मैं  नही  रहूंगा  तुम्हे  भीड़  की  नजरों  से  बचाने  के  लिए  वहां  ये  काला  टिका  ही  तुम्हारे  साथ  रहेगा  और  इस  रिश्ते  के  लिए  भी  यही  होगा।" 
           ना  जाने  क्यों  एकदूसरे  से  किये  वादे  को  भूल  वो  रोते  हुए  मेरे  गले  से  लग  गयी  और  उसने  जिसतरह  से  मुझे  बाहों  में  जकड़ा  था  वो  पहली  बार  था।  यू  तो  इन  3 सालो  में  उसने  कई  बार  मुझसे  i love u  कहा  था  पर  उस  पल  उसने  जब  मुझसे  i love u  कहा  तो  मैं  उसकी  आवाज़  की  कपकपाहट  साफ  सुन  सकता  था,  खुद  को  सम्भालते  हुए  मैंने  उससे  कहा  कि  "रोने  से  ये  मसले  हल  नही  होंगे,  हौसला  रखो  हम  साथ  है  और  आगे  भी  साथ  होंगे।"       

           उसने  मेरा  हाथ  पकड़ा  और  छत  के  एक  कोने  पर  ले  गयी  और  आसमान  की  तरफ  दिखा  कर  बोली  कि  "बारिश  ने  कितनी  सिद्दत  से  मोहब्बक्त  की  होगी  न  कि  उसे  रोने  के  लिए  ये  जमीन  नसीब  हुई"  मैं  समझ  गया  उसकी  बात  को  और  उसकी  आँखों  से  छलके  आसुओ  को  उसके  गालो  से  पोछते  हुए  मुस्कुराकर कहा  कि  "सीखने  लगी  हो  तुम  पर  तुम्हे  तो  पता  है  न  कि  मैं  तुमसे  अलग  नही  रह  सकता  क्योंकि  तुम  तो  हर  जगह  हो  इस  बादल  में  इन  ठंडी  हवाओं  में  इस  रात  में  इन  पेड़ों  की  साखो  में  और  तुम  उन  बरसते  बादलो  में  भी  होगी  जो  इस  जमीन  पर  गिरकर  मुझे  तुम्हारे  करीब  होने  का  एहसास  दिलाती  रहेगी।" 
      बातों  बातों  में  कितना  वक़्त  गुजर  गया  कुछ  खबर  ना  थी,  तभी  उसे  कॉल  आया  कि  उसके  पापा  उसे  लेने  आये  है  पर  वो  जाना  नही  चाहती  थी  फिर  भी  मुझसे  हाथ  छुड़ा  कल  मिलने  को  बोलकर  वहां  से  चली  गयी



Chapter-8
                 आने वाला कल

कॉलेज  का  मेरा  आखिरी  साल  खत्म  होने  को  था  लगभग  हम  सभी  दोस्तों  को  कॉलेज  के  कैंपस  से  जॉब  मिल  गयी  थी  पर  साथ  कोई  नही  था  सभी  को  अलग-अलग  जगहों  पर  जाना  था।  पूरे  1  साल  हो  चुके  थे  हम  दोनों  की  मुलाकात  नही  हुई  थी...


Comments

Popular posts from this blog

मेरी अनकही कहानी(4)

       वो  आखिरी  पल chapter(4)                       Last chapter               कई  बार  मोहब्बक्त  में  गलतफहमियां  हो  जाती  है,  और  उस  एक  गलतफहमी  का  मुआवजा  हम  पूरी  जिंदगी  भरते  है।...  अक्सर  सफर  और  मंज़िल के  बीच  मे  ही  प्यार  दम  तोड़  देता  है  और  यही  अधूरी  कहानियां  ही  हमारे  सफर  को  खूबसूरत  बनाती  है...  कुछ  ऐसी  ही  अधूरी  कहानी  है  मेरी  जिसे  एक  हसीन  मुकाम  देकर  छोड़  दिया  मैंने  और  आजतक  उस  मोहब्बक्त  को  ना  सही  पर  उस  एक  पल  को  यादकर  जरूर  मुस्कुराता  हूं,  जब  सच  मे  मुझे  एहसास  हुआ  कि  शायद  यही  प्यार  है। प्यार  ढूंढने  में  उतना  वक़्त  नही  लगता  जनाब!  जितना  उसे  समझने  और  समझाने  में  लगता  है।। मैं  बता  रहा  था  कि  अब  हमारी  मुलाकाते  बढ़ने  लगी  थी,  अब  अक्सर  कहू  तो  हम  हर  दूसरे  दिन  मिलते  थे।  खूब  सारी  बाते  होती  थी,  वो  मुझे  अपने  बारे  में  बताती  और  मैं  उसे  उसके  ही  बारे  में  बताता।...                         वो  कहती  कि  बहुत  बोलती  हु  ना  मैं!  मैं  कहता  तुम्हारा  खामोश  रहना  च

धर्म संघर्ष!

मैं   माफी  चाहता  हू   क्योंकि  ये  ब्लॉग  थोड़ा  लम्बा  हो  गया  है  पर  आप  सभी  से  एक  ही  बिनती  है  कि  इसे  आखिरी  तक  पढ़े - मैंने  पढ़ी  है  एक  किताब! जिसमे  लिखे  है  जीवन  सभ्यता  के  जवाब! जवाब  देने  वाले  का  होना  भी  एक सवाल  था। सबको  पता  है  ये  मुद्दा  राजनीति  के  लिए  बेमिसाल  था। मैं  करता  हु  सादर  प्रणाम  अपने  प्रभु  को, जिन्होंने  सिखायी  जीवन  जीने  की  सभ्यता  हम  सभी  को! ये  कहानी  उनकी  है  जिन्हें  जानते  सब  है,  पर  पहचानना  कोई  नही  चाहता  था। ये  कहानी  उनकी  है  जो  रहते  तो  सबके  दिलों  में  है,  पर  जुबान  पर  कोई  नही  लाना  चाहता  था। ये  कहानी  है  उनकी  जिन्हें  मानने  वालों  ने  उन्हें  सरआंखो  पर  बैठा  रखा  है। ये  कहानी  उनकी  है  जिन्हें  ना  चाहने  वालो  ने  आजतक,  बस  बहस  का  मुद्दा  बना  रखा  है। ये  कहानी  उनकी  है,  जो  पिछले  500वर्षों  से  अपनी  ही  जमीन  पर  अपना  हक  मांग  रहे  थे। ये  कहानी  उनकी  है,  जो  ना  जाने  कितने  ही  बरसो  से  बस  राजनेताओ  के  लिए  राजनीति  का  मुद्दा  बन कर  रह  गए 

आज़ादी...

आज  हमारे  74वें  स्वतन्त्रता  दिवस  की  आप  सभी  को  मेरे  और  मेरे  परिवार  की  तरफ  से  हार्दिक  बधाईया!    भगवान  करे  कि  अपने  देश  की  अखंडता  और  आज़ादी  को  हमसब  साथ  मिलकर  आगे  ले  जाये वैसे  तो  आज  आज़ादी  का  जश्न  मनाने  का  दिन  है,  पर  साथ  ही  साथ  कुछ  सोचने  का  दिन  भी  है,  की  हमसे  चूक  कहा  हुई  है... मेरा  नमन  है  उन  वीर  जवानों  को जिन्होंने  आज़ादी  के  लिए  अपने  प्राण  त्याग  दिए  और  उनको  जो  इस  तिरंगे  की  शान  को  हमेसा  ऊपर  उठाएं  रखने  के  लिए   आज  भी  इसकी सुरक्षा  में  खड़े  है...  आज  भी  भारत  देश  को  आज़ाद  रखने  के  लिए  अपने  प्राणों  की  आहुति  देने  से  पीछे  नही  हटते।                       ये  हमारे  देश  की  बिडम्बना  ही  है  कि  हम  जिस  आज़ादी  की  लड़ाई   74साल  पहले  जीते  थे  उस  जीत  के  सिर्फ  2,   4  नामो  के  अलावा  किसी  को  नही  जानते  है  या  कहू  की  हमे  पूरा  सच  बताया  ही  नही  गया  की  हमे  किसका  किसका  सम्मान  करना  है।  मैं  भी  इस  टॉपिक  को  छेड़ना  चाहता  हु  क्योंकि  मुझे  पता  है  कि  किसी  को  नही