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Jindgi Aur Sapne (part-3)

# मंज़िल ~~~ कई  बार  हमें  अपनी  मंज़िल  पता  नही  होती  है,  पर  फिर  भी  हम  चलते  रहते  है  लेकिन  कहि  न  कही  रास्ते  के  किसी  मोड़  पर  जब  हम  कुछ  पल  के  लिए  रुकते  है,  तब  ख्याल  आता  है  कि  लोगो  को  देखकर  ये  जो  रास्ता  चुना  है  मैंने  क्या  इन  रास्तों  पर  चलते  हुए  कोई  मुझे  मुझ  जैसे  मिलेगा  या  फिर  शायद  एक  रोज़  इन  बेमन  के  रास्तों  पर  चलते-चलते  मैं  खुद  का  वजूद  कहि  खो  दूंगा  और  एक  दिन  शायद  किसी  मंज़िल  तक  मैं  पहुच  भी  जाऊं  लेकिन  अगले  ही  पल  मुझे  खुद  को  ढूंढना  होगा। मंज़िल  से  भटके  हुए  इंसान  पर  आधारित  एक  कविता  कृपया  इसे  पूरा  अवश्य  पढ़ें! धन्यवाद🙏 ~~~ मैं  तलाश  में  हू   खुद  के  ढूंढता  हू दर-ब-दर  अपने  ही  निशान! कभी  ख्यालो  के  पीछे  ढूंढता  हू   खुद  को, कभी  दरवाज़े  के  पीछे  तलाशता  हू ! किसी  आवाज़  का  पीछा  कर  लेता  हूं  यूही  कभी, कभी  लाख  चिल्लाने  पर  भी  सन्नाटा  पसरा  रहता  है! ना  जाने  कहा  खो  दिया  मैंने  खुद  को! कभी  परछाइयों  के  पीछे  भागता  हू , कभी  आईने  में  तलाशता  हू   खुद  को! कभी 
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Engineering aur pyaar -4

           कुछ  एक  पल  में  कई  बार  हम  सदियां  जी  लेते  है।         अपनी  मोहब्बक्त  को  करीब  पाकर  हम  यूही  मुस्कुरा  लेते  है। यू  तो  वो  रात  उसके  नाम  की  थी  पर  उस  रात  की  कहानी  लिखने  का  हक़  मेरे  पास  था... मुझे  ये  तो  समझ  आ  चुका  था  कि  मेरी  कहानियों  में  वो  खोने  लगी  है।  वो  तलाशने  लगी  थी  खुद  को  मेरे  हर  लफ्ज़  में,  जैसे  उसे  समझ  आ  गया  था  वो  कॉलेज  वाली  लड़की  कोई  और  नही  बल्कि  वो  खुद  है  और  जिसकी  तारीफ  में  मैं  अपनी  पहचान  तक  भूल  गया  वो  तारीफ  उसी  की  है,  उस  रात  वहां  से  निकलने  से  जरा  पहले  ही  उसकी  और  मेरी  नजरे  टकरायी  और  ऐसा  लगा  जैसे  पलके  एक  बार  से  दूसरी  बार  झपकने  के  बीच  में  जो  वक़्त  लेती  है  वो  वक़्त  वही  ठहर  सा  गया  हो,  जैसे  उस  वक़्त  आस-पास  जो  कुछ  भी  हो  रहा  था  सब  थम  सा  गया  था।  इतने  में  किसी  ने  मुझे  आवाज़  दी  और  मैं  जैसे  किसी  ख्वाब  से  वापस  आया  था,  अब  जैसे  तैसे  उस  पार्टी  को  खत्म  कर  के  मैं  अपने  रूम  पर  पहुचा  पर  उस  कमबख्त  रात  ने  जैसे  ना  गुजरने  का

वर्ष 2020

      इस  साल  का  ये  मेरा  पहला  ब्लॉग  है,  हालांकि  नया  साल  शुरू  हुए  10  दिन  बीत  चुके  है... पर  ब्लॉगिंग  साइट  में  थोड़ी  दिक्कत  की  वजह  से  मैं  असमर्थ  था।  नए  साल  में  बीते  साल  की  कुछ  बाते  लिख  रहा  हू,  उम्मीद  करता  हू  आपको  पसंद  आएगा ~~~ 2020  ने  हमे  कितना  कुछ  है  सिखाया। Work  From  home  और  lockdown  से  लेकर  "रामायण" तक  ट्रेंड  में  है  आया। घर  पर  रहने  की  मजबूरी  कहो  या  माँ  के  हाथ  के  खाने  की  खुशी, ये   पू रा   साल  कई  उतार  चढ़ाव   लेकर  था  आया। इस  पूरे  साल  हम  एक  अलग  ही  दुनिया  मे  जैसे  जी  रहे  हो,  जैसे  बचपन  मे  हमे  घरों  में  बंद  कर  दिया  जाता  था  और  हम  चिल्ला  चिल्लाकर  पूरी  कॉलोनी  को  हिला  देते  थे,  कुछ  वही  हाल  था  हमारा।  पर  अब  वो  चिल्लाना  नही  था  बस  थी  तो  खामोशी,  बेचैनी  और  चैन  से  सांस  ना  ले  पाने  की  फिक्र... थाली  पीटने  से  लेकर  मोमबत्ती  जलाना  भी  देखा  है। चाइना  को  हमने  बॉर्डर  से  पीछे  हटाते  भी  देखा  है। राम  मंदिर  की  नींव  रख  दीवाली  बिन  दिया  जलाया  है 

Engineering aur pyaar (3)

                            मुलाकात... यू  तो  हर  कोई  हर  किसी  के  लिए  अलग  ही  होता  है  पर  कोई  किसी  का  खास  तब  ही  बनता  है  जब  वो  खास  बनना  चाहता  है । ~~~          अब  सारी  मस्तियों  के  बीच  सर्दियों  ने  दस्तक  दे  दी  थी  और  साथ  ही  सेमेस्टर  भी  हमारे  करीब  आ  गया  था,  और  तैयारी  के  नाम  पर  मैंने  सिर्फ  प्यार  की  कविताएं  ही  लिखी  थी।  अब  जब  भी  पढ़ने  बैठता  तो  दिमाग  के  साथ  कि  गयी  थोड़ी  जोर-जबरजस्ती  काम  आ  जाती  जिससे  कुछ  देर  तो  मैं  पढ़  लेता  पर  थोड़ी  ही  देर  बाद  उसका  चेहरा ,   उसकी  आंखें ,   उसकी  हंसी  सब  जैसे  मेरी  किताबो  में  छप  गया  हो।  अब  ये  समझ  आने  लगा  था  कि  क्यों  हमे  प्यार-मोहब्बक्त  से  दूर  रहने  को  कहा  जाता  है।  कॉपी  पर  सवाल  लगाते  लगाते  कब  पेन  को  उस  कॉपी  पर  घुमाने  लग  जाता  था  कुछ  पता  ही  नही  होता  था।                 तो  अब  मैंने  तय  किया  था  कि  ये  सब  से  ध्यान  हटाना  है ।   वैसे  तो  मुझे  अकेले  पढ़ने  की  आदत  थी ,   पर  अब  मैंने  दोस्तो  के  साथ  पढ़ना  शुरू  कर  दिया।  जैसे-तै

Engineering aur pyaar (2)

                    मोहब्बक्त की  बात आज  कॉलेज  से  आने  के  बाद  से  ही  तबियत  कुछ  बिगड़ी  सी  लग  रही  थी,  हाल  कुछ  ऐसा  था  जैसे  सबकुछ  कहि  छोड़कर  आ  गया  हूं।  मैं  पूरी  रात  ना  जाने  किन   उलझनों  में  उलझा  रहा,  मैं  एक  ऐसे  ख्याल  में  था  जिसमे  याद  कर ने   को  ना  कोई  पहचान  थी,  ना  उसकी  मुस्कान  नाही  उसकी  बातें  थी...  थी  तो  बस  उसकी  एक  झलक,  उस  रात  की  कहानी  कुछ  ऐसी  थी ...           अगले  कुछ  दिन  कॉलेज  में  उसके  बारे  में  जानने  में  निकल  गए।  वो  कॉलेज  हमेशा  स्कूटी  से  आती  है,  वो  लोगो  से  कम  मिलना  और  कम  बाते  करना  पसंद  करती  है,  उसके  कुल मिलाकर  4  6  ही  दोस्त  थे  तो  अब  मेरी  मुश्किलें  और  बढ़ने  वाली  थी।  यू  तो  आते  जाते  मुलाकाते  हो  ही  जाती  थी,  क्योंकि  कई  बार  ये  आंखे  टकराती  जो  थी...  पर  अभी  सबकुछ  अधूरा  सा  था, एकतरफा... अब  कॉलेज  में  जाते  हुए  कई  दिन  बीत  चुके  थे  अब  सब्जेक्ट्स  का  बोझ  सिर  पर  बढ़ता  जा  रहा  था  और  जैसे  जैसे  मैं  उस  चेहरे  को  और  ज्यादा  देख  रहा  था  वैसे  वैसे मैं

छठ पूजा!🙏

  छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है।  इसकी शुरुआत  कार्तिक शुक्ल चतुर्थी  को तथा समाप्ति  कार्तिक शुक्ल सप्तमी  को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं।   इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते। छठ में कोई  मूर्तिपूजा  शामिल नहीं है। शुरुवात- छठ पूजा की परम्परा और उसके महत्त्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएँ प्रचलित हैं। देव सूर्य मंदिर (बिहार) Image source: google मान्यता है की देव माता अदिति ने की थी  छठ  पूजा। एक कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के  देव सूर्य मंदिर  में छठी मैया की आराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलायी। कहते हैं कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और  छठ  का चलन भी शुरू हो गया। रामायण से                          एक मान्यता के अनुसार 

Engineering Aur Pyaar (1)

        कॉलेज  का  पहला  दिन... (Chapter-1)                        आज  मेरा  कॉलेज  का  पहला  दिन  था...  हर  कोई  जब  पहले  दिन  कॉलेज  जाता  है  तो  ना  जाने  कितना  उत्साह  अंदर  उमड़ता  रहता  है।  सबकुछ  पाने  की  सबकुछ  देखने  की  और  बहुत  कुछ  करने  की  इच्छाएं  मन  मे  जगह  बनाती  है  और  हम  थोड़ा  डरते  भी  है... और  साथ  ही  ऐसा  लगता  है  जैसे  आसमान  में  हो  क्योंकि  अब  जाकर  पहली  बार  हम  अपने  घर  से  कही  दूर  आये  होते  है...         ऐसा  ही  कुछ  हाल  था  मेरा  आज  वो  पहला  दिन  है  जब  मैं  सच  मे  कुछ  बनने  का  सोचने  की  जगह  कुछ  बनने  की  कोशिश  करने  जा  रहा  था...   और  शायद  ये  मेरी  जिंदगी  का  पहला  ऐसा  कदम  था,  जहाँ  से  अब  सारे  रास्ते  मुझे  खुद  ही  तय  करने  थे। कॉलेज  शुरू  होने  के  2दिन  पहले  ही  मैंने  कमरा  ले  लिया  था,  हम  दो  दोस्त  साथ  ही  आये  थे  लेकिन  उसने  c.s  चुना  और  मैंने  मैकेनिकल ....  वैसे  तो  कॉलेज  में  दाखिले  के  लिए  2...3  बार  आ  चुके  थे।                      लेकिन  वो  पहला  दिन,  जब  कंधे  पर  एक  बैग